एक व्यक्ति और है, जो चाहता है कि शंकरजी का विवाह पार्वतीजी से हो जाय। वह है काम, पर भगवान शंकर दोनों के प्रति अलग-अलग व्यवहार करते हैं। वे भगवान राम की तो स्तुति करते हैं, उन्हें नमन करते हैं और उनकी आज्ञा का पालन करने का वचन देते हैं और जब काम वही चेष्टा करता है, तो उसे जलाकर नष्ट कर देते हैं। ऐसा क्यों? मूलतः काम की निन्दा की जाती है। क्यों? एक दृष्टांत लें - जैसे, आप किसी व्यक्ति को दूध पिलायें और सोचें कि इससे उसकी शक्ति बढ़ेगी और वह स्वस्थ रहकर अधिक सेवा-कार्य कर सकेगा। फिर एक प्रक्रिया यह भी है कि किसी व्यक्ति से काम लेने के लिए उसे शराब पिला दें और उसमें जोश पैदा कर उससे काम लें। अब दूध की प्रक्रिया और शराब की प्रक्रिया में अन्तर है। दूध के द्वारा शरीर में जो स्फूर्ति आती है, स्वथ्यता आती है, वह क्रमिक रूप से आती है, पर जब व्यक्ति शराब पीता है, तो उसमें स्वथ्यता नहीं आती, लेकिन तत्काल उसे क्षणिक जोश का अनुभव होता है तथा वह अपने को स्वथ्य और सबल समझने लगता है।
Monday, 27 July 2015
Sunday, 26 July 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्.............
कई महापुरुष अन्तर्मुखी होते हैं। वे अपने आनन्द में डूबकर आनन्द के उत्स को प्राप्त करना चाहते हैं और इसमें वे सफल भी होते हैं, परन्तु उनकी अन्तर्मुखता से दूसरों की समस्याओं का समाधान नहीं होता। भगवान शंकर के संदर्भ में यही बात कही जा सकती है। उन्हें सुख पाने के लिए पत्नी की आवश्यकता नहीं है। वे पूरी तरह से अन्तर्मुखी हैं। उनकी अन्तर्मुखता उन्हें पूर्ण आनंद प्रदान कर रही है, पर सारा समाज तथा स्वयं पार्वतीजी उन्हें पाने के लिए प्रयत्नशील हैं। भगवान राम यहाँ पर भी एक सामंजस्य स्थापित करते हैं। अभी तक शिवजी नेत्र मूँदकर समाधि की अवस्था में भगवान राम का दर्शन कर रहे थे। अब भगवान राम उनके सम्मुख प्रकट हो गये। इसके माध्यम से उन्होंने दर्शाया कि मैं भीतर ही नहीं वरन बाहर भी हूँ। वे शंकरजी को अन्तर्मुखता त्यागकर बाहर आने के प्रेरित करते हैं।
Saturday, 25 July 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्............
व्यक्ति दो प्रकार के होते हैं- एक को सामीप्य में अधिक रसोत्पत्ति होती है और दूसरे को सामीप्य में धीरे - धीरे रसाभास हो जाता है। यही हनुमानजी और अंगद के स्वभाव की भिन्नता है। हनुमानजी ऐसे हैं कि समीप रहकर भी उनकी रसानुभूति में कमी नहीं आती, बल्कि बढ़ती ही रहती है, जबकि अंगद के जीवन में यह संभावना अधिक है कि वे ईश्वर से दूर रहकर उनके रस की स्मृति में अधिक डूबेंगे। इसलिए भगवान राम उन्हें लौटा देते हैं और इस प्रकार श्री राघवेन्द्र काम-काज और राम-काज में एक व्यवहारगत तथा चरित्रगत सामंजस्य प्रस्तुत कर जीव की मनोग्रन्थि का छेदन करते हैं।
Friday, 24 July 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्...........
वैसे तो बन्दरों ने भगवान राम को पहले ही पा लिया था, पर श्रीराम को पाने के बाद भी राम-राज्य तब बना जब रावण का नाश हुआ और सीताजी लंका से लौटायी गयीं। इसका तात्पर्य यह है कि जीवन में परिपूर्णता ईश्वर की उपस्थिति से ही नहीं आती, बल्कि तब आती है जब समस्त दुर्गुणों के विनाश के पश्चात चरम शांति की उपलब्धि होती है। तभी व्यक्ति के जीवन में समग्रता आती है। इसलिए राम को पाने के बाद भी दुर्गुणों से लड़ना होगा, लंका में युद्ध करना होगा और बंदर यह कार्य करते हैं। श्री सीताजी और श्रीराम का मिलन होता है, तब राम-काज पूरा होता है।
Thursday, 23 July 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्..............
सीताजी की खोज ही राम-काज है। हनुमानजी के चरित्र में राम-काज का यह महामंत्र बार-बार परिलक्षित होता है। जब वे सीताजी की खोज में चल पड़ते हैं तो रास्ते में मैनाक पर्वत पड़ता है। मैनाक ने कहा, यहाँ आकर थोड़ा विश्राम कर लो। हनुमानजी ने तुरन्त कहा - श्रीराम का कार्य किए बिना मुझे कोई विश्राम नहीं है। हनुमानजी जी जब आगे बढ़े तो सुरसा मिली। सुरसा ने कहा कि मुझे भूख लगी है, आकर मेरे मुँह में पैठ जाओ। हनुमानजी ने कहा कि नहीं, अभी नहीं। पहले श्रीराम का कार्य करके आ जाउँ। तात्पर्य यह है कि हनुमानजी के चरित में राम-काज को छोड़कर और कुछ नहीं है। और जब वे प्रभु का कार्य करके लौटते हैं, तो प्रत्येक बंदर को यह सोचकर धन्यता का अनुभव होता है कि हनुमानजी भगवान राम का कार्य करके लौटे हैं। फिर इसके पश्चात लंका में राक्षसों से युद्ध होता है। तात्पर्य यह है कि सीताजी को, भक्तिदेवी को पाने के लिए राक्षसों से अर्थात दुर्गुणों से लड़ना होगा।
Wednesday, 22 July 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्...........
सुग्रीव किष्किन्धा का सिंहासन पाकर प्रारंभ में काम-काज और राम-काज दोनों ही कार्यों में अनुत्तीर्ण हो जाते हैं। उन्होंने राम-काज की ओर तो ध्यान दिया ही नहीं, बल्कि बहुत दिनों तक भोगों से दूर होने के कारण भोगों में ऐसे लिप्त हुए कि राज-काज भी भूल गये। यह भी भूल गये कि अंगद के प्रति ऐसा व्यवहार न हो कि प्रभु रुष्ट हो जाएँ। सुग्रीव काम-रस में डूबकर भक्ति के मूल श्रीराम को भूल गये। जीवन में सब कुछ पाकर व्यक्ति के जीवन में ईश्वर के प्रति भक्ति आनी चाहिए, कृतज्ञता का भाव आना चाहिए, पर सुग्रीव के साथ सब उलटा होता है। जीव की दशा सुग्रीव की दशा जैसी है। वह ईश्वर की दी हुई भेंटों को स्वीकार तो कर लेता है, पर भोगों में डूबकर उन्हें भूल जाता है। जब व्यक्ति भगवान के किये गये उपकारों को भुलाकर भोग में डूब जाता है तब भगवान काल का स्मरण करते हैं। यह काल ही श्रीराम का, ईश्वर का, धनुष है और घण्टा, दिन, महीना, वर्ष, युग और कल्प के रूप में समय का जो विभाजन है वही उनका बाण है। तात्पर्य यह है कि कालरुपी धनुष से समयरूपी बाण चल रहा है और लोग नाश को प्राप्त हो रहे हैं।
Tuesday, 21 July 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्.............
श्रीराम बालि का वध करके सुग्रीव को सिंहासन पर बैठाते हुए कहते हैं - तुम अपना राज्य अंगद के साथ चलाओ। इसके माध्यम से भगवान राम व्यवहार का, काम-काज का मूलमंत्र देते हैं। कैसे? भगवान राम ने कहा कि तुम किष्किन्धा का राज्य चलाओ, पर अकेले नहीं, अंगद के साथ चलाओ। भगवान राम का यह वाक्य केवल सुग्रीव के लिए नहीं वरन उन समस्त लोगों के लिए महत्व का है, जिन्हें समाज और संसार में व्यवहार करना है। अंगद के साथ राज्य चलाना चाहिए, इसका तात्पर्य क्या है? वस्तुतः श्रीराम सुग्रीव और अंगद के मन की दूरी से परिचित हैं। उन्होंने किष्किन्धा का राजा तो सुग्रीव को बनाया, पर उत्तराधिकार बालि के पुत्र अंगद को दिया। इसका अभिप्राय यह है कि परिवार अथवा समाज में जो आपसी टकराहट होती है, वह अपने और पराये के भेद को लेकर होती है। यदि भेद बुद्धि न हो तो न तो परिवार में टकराहट होगी और न समाज में।
Monday, 20 July 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्.................
व्यवहार में प्रश्न किया जाता है कि मनुष्य काम-काज करे कि राम-काज, अर्थात जीवन के कार्यों का निर्वाह करे अथवा भगवान की भक्ति करे ? इससे ऐसा लगता है कि काम-काज और राम-काज में विरोध है। इसका उत्तर हमें रामचरितमानस में मिलता है। भगवान राम ने जब बालि का वध किया तो उसके पश्चात सुग्रीव को तुरंत यह आदेश नहीं दिया कि तुम सीता का पता लगाओ। सीताजी मूर्तिमती भक्ति हैं और भक्ति प्राप्त करना जीवन का चरम लक्ष्य है। श्रीराम बालि का वध करके सुग्रीव को सिंहासन पर बिठाकर कह सकते थे कि अब सीताजी की खोज में लग जाओ, पर वे वैसा नहीं कहते। वे जानते हैं कि किसके चरित्र का विकास कैसे होगा ? वे सुग्रीव से कहते हैं - तुम काम-काज करो अर्थात राज्य करो। साथ ही श्रीराघवेन्द्र एक महामंत्र यह भी देते हैं कि राजकार्य के साथ एक कार्य और करना है - ह्रदय में मेरे कार्य का सदा ध्यान रखना। राज-काज में राम-काज को मत भूल जाना। वस्तुतः जिसे हम राम-काज कहते हैं, वह भी जीव का ही काज है। अब आप विचार करके देखिए - यह जो सीताजी की, भक्ति या शांति की उपलब्धि है, वह तो जीव के स्वयं के लिए कल्याणकारी है। यदि हम भक्ति या शांति की खोज में चलते हैं, तो उससे हम ईश्वर पर उपकार नहीं करते, पर ईश्वर इतने उदार हैं कि कहते हैं कि सीताजी का पता लगाना मेरा कार्य है, इसलिए राज-काज के साथ मेरे कार्य का भी ध्यान रखना।
Saturday, 18 July 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्.............
मनुष्य के मन में रहने वाला जो काम है, वही मानो वात है। आयुर्वेदशास्त्र में वात की चिकित्सा को सबसे कठिन बताया गया है। या यों कह सकते हैं कि यद्यपि सभी मनोविकार बड़े जटिल हैं, फिर भी काम की जटिलता सबसे अधिक है। इसलिए रामचरितमानस में काम की समस्याओं के निदान का वर्णन काम-रोग के सर्वश्रेष्ठ वैद्य भगवान शंकर के चरित्र के माध्यम से किया गया है। काम की जो विकृतियाँ सामान्य मनुष्य और साधक के जीवन में दिखाई देती है, उनकी चिकित्सा का संकेत भगवान शंकर के चरित्र में प्राप्त होता है। वैसे तो भगवान शंकर समस्त मानस-रोगों के महान वैद्य हैं, पर उनकी सबसे बड़ी विशेषता इस काम-रोग को विनष्ट करने में है और इसलिए उनके अनेक नामों में एक नाम कामारि भी है।
Friday, 17 July 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्..............
मनुष्य के अन्तःकरण में जो गुणों के बीज हैं, वे सत्संग और कुसंग के कारण अंकुरित होते हैं. अगर कुसंग के जल की वर्षा हो जाय तो अन्तःकरण में छिपे हुए दुर्गुण सामने आ जाते हैं. इसीलिए यह बार-बार कहा गया है कि व्यक्ति को कुसंग से बचना चाहिए, इसका तात्पर्य यह है कि अगर वर्षा ही नहीं होगी तो अंकुर भीतर से कैसे फूटेगा ? अतएव यदि हम उन सहयोगियों के, जो हमारे दुर्गुणों को, हमारी दुर्बलताओं को बढ़ा दिया करते हैं, सन्निकट नहीं जावेंगे तो भले ही हमारे जीवन में दुर्गुणों के संस्कार विद्यमान हों, वे उभर नहीं पावेंगे. मानवीय जीवन के सद्गुणों के अंकुरित होने के लिए जिस जल की अपेक्षा है, वह है सत्संग का जल.
Thursday, 16 July 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्..........
अयोध्या में गुरु वसिष्ठ हैं। वे वैद्य हैं। पर वे भी अनुभव करते हैं कि मानस-रोग अयोध्या में इतना बढ़ गया है कि उसे दूर करना उनके द्वारा संभव नहीं है। तब एक दूसरे वैद्य बुलाए जाते हैं, जो रामायण के श्रेष्ठतम वैद्य हैं। मंथरा और कैकेयी के द्वारा जो रोग फैला दिया गया था, उसे वसिष्ठ जैसे वैद्य दूर करने में समर्थ नहीं थे। उसके लिए किसी और उत्कृष्ट वैद्य की आवश्यकता थी। वे थे श्रीभरतजी। भरतजी की चिकित्सा क्या थी ? वे सारे समाज को साथ लेकर चित्रकूट जाते हैं और वहाँ सबको भगवान राम से मिला देते हैं। भगवान राम का दर्शन प्राप्त करके लोग परम पद के अधिकारी बन जाते हैं, पर भरतजी के दर्शन का क्या फल होता है ? भरतजी के दर्शन से तो उनका भवरोग ही मिट गया। अयोध्या का अस्वस्थ समाज भरतजी के औषध से कैसे स्वथ्य होता है यह एक विश्लेषण का विषय है।
Wednesday, 15 July 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्.............
जब अयोध्या में महाराज दशरथ अस्वस्थ हो गये, कैकेयी अस्वस्थ हो गयीं, मंथरा और सारा समाज अस्वस्थ हो गया, तो भगवान राम और सीताजी वन को चले जाते हैं। भगवान राम हैं साक्षात ईश्वर और सीताजी हैं मूर्तिमती शांति। तात्पर्य यह है कि जब व्यक्ति और समाज मानस-रोग से ग्रस्त होता है, ईश्वर और शांति दोनों उसके जीवन से दूर चले जाते हैं।
Tuesday, 14 July 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्............
दशरथजी को दासियों ने सूचना दी कि कैकेयी कोपभवन में बैठी हुई हैं, अर्थात रूग्ण हैं। कैसा रोग ? गीता में कहा गया है - संग से काम का उदय होता है और काम से क्रोध का। तात्पर्य यह है कि मंथरा के संग से कैकेयी के भीतर भरत को राज्य दिलाने की कामना का उदय हुआ और उसमें राम को बाधक समझकर क्रोध उत्पन्न हो गया। इसलिए वे कोपभवन में बैठी हैं। उनका रोग क्रमशः वृद्धि की ओर जा रहा है। ऐसी दशा में महाराज दशरथ को चाहिए था कि वे कैकेयी के पास न जाकर लौट जाते और वैद्य को भेजते। वैद्य कौन है - गुरु वसिष्ठ। वे आकर कैकेयी की चिकित्सा करते, लेकिन महाराज दशरथ स्वयं कैकेयी के कोपभवन में चले जाते हैं। कैकेयी कोपभवन में है यह सुनकर राजा सहम गये। डर के मारे उनका पाँव आगे की ओर नहीं पड़ता। महान प्रतापी राजा दशरथ स्त्री का क्रोध सुनकर सूख गये। काम का प्रताप और महिमा तो देखिए। तात्पर्य यह है कि महाराज दशरथ के जीवन में अन्य दुर्बलताएँ नहीं थीं - उनमें लोभ नहीं था, क्रोध नहीं था तथा उनके चरित्र में अनेक बडे-बड़े सद्गुण थे, पर काम की दुर्बलता उनके जीवन में बीजरुप में विद्यमान थी। कैकेयी की सुन्दरता के प्रति वे मुग्ध थे। महाराज दशरथ कैकेयी को स्वथ्य बनाने में समर्थ नहीं हुए। परिणाम यह होता है कि कैकेयी की अस्वस्थता तो दूर होती नहीं, महाराज दशरथ मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं।
Monday, 13 July 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्..............
जीवन में यदि लोभ आ जाय तो इसका अभिप्राय है कि कफ बढ़ रहा है। शरीर में थोड़ा कफ रहे, यह उचित है, क्योंकि वह भी शरीर का एक भाग है, पर यदि कफ बढ़ने लगे, तो वह अस्वस्थता की निशानी है। जब कफ बढ़ने लगता है, वह ह्रदय को पूरी तरह से जकड़ लेता है, यहाँ तक कि साँस लेना भी कठिन हो जाता है। इसका अभिप्राय यह हुआ कि समाज में अगर लोकव्यवहार के लिए लोभ बना रहे तो अनुचित नहीं है, क्योंकि व्यक्ति जब जीवन को चलाने के लिए व्यापार करता है, नौकरी करता है, तो किसी न किसी सीमा तक उसे लोभ को स्वीकार करना ही पड़ता है। जिस प्रकार उचित परिमाण में कफ की मात्रा शरीर को स्वथ्य रखती है, उसी प्रकार धन का उपयोग परिवार, समाज तथा देश के लोक-हितकर कार्यों में होने से लोभ की सार्थकता होती है, लेकिन जैसे कफ का अतिरेक होने से ह्रदय जकड़ जाता है, उसी प्रकार लोभ का अतिरेक होने से ह्रदय कठोर हो जाता है, लोभरुपी कफ ह्रदय में ऐसे जम जाता है कि उसे निकालना कठिन हो जाता है।
Sunday, 12 July 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्..............
मंथरा ने जब आकर कैकेयी को समाचार दिया कि कल राम को राज्य प्राप्त होने वाला है, तो कैकेयीजी के ह्रदय में कोई दुःख नहीं हुआ, न कोई जलन हुई, वरन प्रसन्न होकर बोली - मंथरा! तुमने इतना सुंदर समाचार सुनाया है कि यदि सचमुच कल राम को राज्य मिलने वाला है तो तुम जो माँगोगी वही मिलेगा। इससे लगता है कि कैकेयीजी में राजयक्ष्मा के कोई लक्षण नहीं है, पर यह बड़ी छूतवाली बीमारी है। मंथरा से थोड़ी देर उनका वार्तालाप हुआ नहीं कि मंथरा के मुँह से उनके कान में ऐसे कीटाणु पैठे कि वे राजयक्ष्मा से पुरी तरह ग्रस्त हो गयीं और दशरथजी से कह उठी कि भरत को राज्य दीजिए और राम को वन। इतना ही नहीं, वे कहती हैं - यदि प्रातःकाल होते ही राम राज्य छोड़कर वनवासी वेश में वन को नहीं जाते हैं तो समझ लीजिए! मेरी मृत्यु होगी और आपको कलंक प्राप्त होगा। तात्पर्य है कि कैकेयीजी में मंथरा के सारे लक्षण आ गये। मंथरा ने उन्हें ऐसी पट्टी पढ़ायी कि वे कहने लगीं, मंथरा ! क्या बताऊँ, मुझसे बड़ी भूल हो गयी, तुमको मैंने सदा अपने पैरों पर बिठाया, तुम आँखों की पुतली बनाकर रखने योग्य हो। और सचमुच मंथरा उसकी आँखों में ऐसी पैठी कि जो मंथरा देखती थी, कैकेयी को वही दिखाई देने लगा। इस प्रकार गोस्वामीजी एक सांकेतिक विवरण देते हैं कि मानसिक रोग का संक्रमण कैसे होता है।
Friday, 10 July 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्............
शरीर के रोगों के संबंध में नियम मन के रोगों के संबंध में भी सत्य है। जिन लोगों के जीवन में मानसिक रोग होते हैं, वे अपने सम्पर्क के द्वारा दूसरों के मन में भी रोग के कीटाणु पैठाकर उनको अस्वस्थ बना देते हैं। आप देखेंगे, अयोध्या में सब स्वस्थ व्यक्ति थे, केवल एक ही व्यक्ति अस्वस्थ मन वाला था। वह थी मंथरा। उसे क्या रोग था ? गोस्वामीजी इसे मानस-रोग के संदर्भ में कहते हैं - दूसरे के सुख को देखकर जो जलन होती है, वह राजयक्ष्मा रोग है। मंथरा को यही रोग हो गया है। उसे सूचना मिली कि कल श्री रामचंद्र का राजतिलक होने जा रहा है, यह सुनकर उसका ह्रदय जल उठा। मानो उसे मानसिक राजयक्ष्मा रोग हो गया। वह यह राजयक्ष्मा लेकर कैकेयी के पास जाती है। कैकेयीजी को देखने से लगता है कि वे स्वस्थ हैं, उनमें कोई दुर्बलता नहीं है, पर वे रोगशून्य नहीं थीं। मंथरा ने उस रोग को उभाड़ दिया।
Thursday, 9 July 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्.............
रामचरितमानस में भिन्न-भिन्न पात्रों के संदर्भ में उनकी अलग-अलग प्रकृति का संकेत देते हुए रोगों का विस्तृत विवेचन किया गया है। यह जो अयोध्याकांड है, वह पूरा आयुर्वेद का चिकित्सा -शास्त्र ही है। इसमें आप देखेंगे कि अलग-अलग व्यक्ति किस प्रकार रूग्ण होते हैं - चाहे वह मंथरा हो या कैकेयी अथवा महाराज श्री दशरथ। रामायण के ये दृष्टांत मानो हमें यह बताने के लिए हैं कि हम इन पात्रों के संदर्भ में यह देखने की चेष्टा करें कि किस पात्र से हमारी प्रकृति मिलती-जुलती है और वह पात्र किस प्रकार स्वस्थ हुआ, तथा यदि नहीं हुआ तो क्यों नहीं हुआ। उससे आप मानसिक रूप से स्वस्थ होने का उपाय देख पायेंगे। अयोध्याकांड के प्रारंभ में हम संकेत पाते हैं कि अयोध्या में बड़े संत, बड़े सच्चरित्र पुरुष थे। साथ ही यह भी कि अगर समाज में सौ व्यक्ति भले हों और एकाध व्यक्ति बुरा हो तो यह सोचकर हमें निश्चिंत नहीं हो जाना चाहिए कि एक व्यक्ति के बुरे होने से समाज पर कोई बुरा प्रभाव नहीं पड़ेगा। समाज में यदि एक व्यक्ति भी अस्वस्थ होगा तो वह दूसरे व्यक्ति को भी अस्वस्थ बना सकता है।
Wednesday, 8 July 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्...........
रावण और कुम्भकर्ण मोह और अहंकार के प्रतीक हैं। मोह और अहंकार से ग्रस्त व्यक्ति सर्वदा दूसरों का ही दोष देखता है। ऐसा व्यक्ति स्वस्थ नहीं हो सकता। जब वह अपने को अस्वस्थ ही नहीं मानेगा तब स्वथ्य कैसे होगा? रावण और कुम्भकर्ण की सबसे बड़ी समस्या यह थी कि वे अपने आपको रोगी के रूप में नहीं देख पाते थे। मानवीय प्रवृत्ति भी ऐसी ही है। कथा में आकर लोगों की बुद्धि और पैनी हो जाती है, पर उस पैनी बुद्धि का सदुपयोग बहुत कम लोग ही करते हैं। इसका कई बार अनुभव होता है। कानपुर में एक दिन कथा में अहंकार की व्याख्या की गयी थी। कथा के पश्चात जब मैं लौट रहा था, तो तीन सदस्य गाड़ी में पीछे बैठे हुए थे और तीनों कथा से प्रभावित थे। पर वे किस रुप में प्रभावित थे यह समझने योग्य बात है। तीनों संवाद करते हुए दूसरे को ही कुम्भकर्ण बता रहे थे। अर्थात तीनों को यही लगा कि कथा मेरे लिए नहीं है, दूसरे के लिए है। किसी को यह प्रतीत नहीं हुआ कि अहंकार मुझमें है। प्रत्येक ने यही सोचा कि अहंकार दूसरे में है और उसे ही दूर करना है। इस वृत्ति से सावधान रहना चाहिए। यह रुद्रगणों वाली वृत्ति है। भगवान राम को रावण और कुम्भकर्ण के रूप में इन रुद्रगणों को मारना पड़ा था।
Tuesday, 7 July 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्..............
हम लोग दूसरों का दोष बड़ी पैनी दृष्टि से देखते हैं। दूसरों के दोष देखने के लिए हमारी आँखें हजार की संख्या में हो जाती है, पर भगवान की दृष्टि क्या है ? वे भी नारद के दोष देखते हैं, पर उनकी दृष्टि वैद्य की है। वैद्य जब रोगी का दोष देखता है, तो उसका उद्देश्य रोगी की निन्दा करना नहीं होता, वरन रोगी के स्वास्थ्य को सुधारना होता है, पर जब कोई विरोधभाव से दूसरे व्यक्ति के दोषों को देखता है, तो उसमें शत्रु के प्रति कल्याण की भावना नहीं होती, वरन उसे प्रसन्नता होती है कि शत्रु में ये दोष विद्यमान हैं। रुद्रगणों ने अपनी पैनी दृष्टि का दुरुपयोग किया। उन्होंने द्वेष भाव से नारद का दोष देखा। परिणाम यह हुआ कि नारद तो शीघ्र स्वथ्य हो गये, पर इन दोषदर्शी रुद्रगणों को स्वथ्य होने में लम्बा समय लगा। ये ही आगे चलकर रावण और कुम्भकर्ण बने।
Monday, 6 July 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्.............
...........कल से आगे .....
राम और काम में ऐसी कुछ समानताएँ हैं कि व्यक्ति सुख पाने के लिए काम का वरण कर लेता है। काम उसे सस्ते में सुख दिलाने का दावा करता है और साधक के मन में सरल और छोटे मार्ग से सुख पाने की इच्छा जाग्रत हो जाती है। इसका सांकेतिक तात्पर्य क्या है? वह यह है कि व्यक्ति में मिलन की तीव्र आकांक्षा होती है, क्योंकि अंश का स्वभाव है पूर्ण को पाना। जीव की सहज प्रवृत्ति है कि वह पूर्ण से मिलना चाहता है, पर काम इस मिलन की आकांक्षा को दूसरी दिशा में मोड़कर यह दिखाने की चेष्टा करता है कि तुम्हारी मिलन की आकांक्षा को हम इसी मृत्यु -लोक में पूरी कर सकते हैं। काम का सारा मनोविज्ञान इतना अनोखा है कि व्यक्ति धोखे में आ जाता है। शंकरजी द्वारा काम को जला देने का तात्पर्य यह है कि कम से कम इतना भेद तो रहे कि राम रूपवाले हैं तो काम बिना शरीर वाला रहे, जिससे साधक दोनों का अन्तर समझ सके। इतना अन्तर डालकर उन्होंने काम को जीवित कर दिया और कहा कि तुम अनंग होकर जीवित रहो।
राम और काम में ऐसी कुछ समानताएँ हैं कि व्यक्ति सुख पाने के लिए काम का वरण कर लेता है। काम उसे सस्ते में सुख दिलाने का दावा करता है और साधक के मन में सरल और छोटे मार्ग से सुख पाने की इच्छा जाग्रत हो जाती है। इसका सांकेतिक तात्पर्य क्या है? वह यह है कि व्यक्ति में मिलन की तीव्र आकांक्षा होती है, क्योंकि अंश का स्वभाव है पूर्ण को पाना। जीव की सहज प्रवृत्ति है कि वह पूर्ण से मिलना चाहता है, पर काम इस मिलन की आकांक्षा को दूसरी दिशा में मोड़कर यह दिखाने की चेष्टा करता है कि तुम्हारी मिलन की आकांक्षा को हम इसी मृत्यु -लोक में पूरी कर सकते हैं। काम का सारा मनोविज्ञान इतना अनोखा है कि व्यक्ति धोखे में आ जाता है। शंकरजी द्वारा काम को जला देने का तात्पर्य यह है कि कम से कम इतना भेद तो रहे कि राम रूपवाले हैं तो काम बिना शरीर वाला रहे, जिससे साधक दोनों का अन्तर समझ सके। इतना अन्तर डालकर उन्होंने काम को जीवित कर दिया और कहा कि तुम अनंग होकर जीवित रहो।
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्..............
व्यक्ति ईश्वर को सुख के लिए पाना चाहता है और काम व्यक्ति के सामने दावा करता है कि मैं तुम्हें सुख दे सकता हूँ। साहित्य में काम का जो वर्णन किया गया है, वह राम से ठीक मिलता -जुलता है। जैसे राम परम सुन्दर हैं, वैसे ही काम को भी परम सुन्दर बताया गया है। राम धनुष-बाणधारी हैं, तो काम भी वैसा है। फिर दोनों का रंग भी साँवला है। शंकरजी ने काम को जला दिया। उनका तात्पर्य था कि तुम राम के स्थान पर आ जाते हो, इसलिए साधक के लिए सबसे अधिक घातक तुम्हीं हो। अतएव तुम्हें मिटा देना चाहिए। जब संसार में कोई मूल्यवान बढ़िया वस्तु बनती है, तो उसके अनुरूप नाम से नकली वस्तु भी बाजार में बिकने आ जाती है। तब नकली वस्तु बनाने वाले नक्कालों से सावधान का विज्ञापन देकर लोगों को सावधान कर देते हैं। सबसे बड़ा खतरा यही है कि असली के धोखे में कहीं नकली वस्तु न खरीद ली जाय। शंकरजी का यही संकेत है।
........आगे कल .......
........आगे कल .......
Sunday, 5 July 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्.........
व्यक्ति ईश्वर को सुख के लिए पाना चाहता है और काम व्यक्ति के सामने दावा करता है कि मैं तुम्हें सुख दे सकता हूँ। साहित्य में काम का जो वर्णन किया गया है, वह राम से ठीक मिलता -जुलता है। जैसे राम परम सुन्दर हैं, वैसे ही काम को भी परम सुन्दर बताया गया है। राम धनुष-बाणधारी हैं, तो काम भी वैसा है। फिर दोनों का रंग भी साँवला है। शंकरजी ने काम को जला दिया। उनका तात्पर्य था कि तुम राम के स्थान पर आ जाते हो, इसलिए साधक के लिए सबसे अधिक घातक तुम्हीं हो। अतएव तुम्हें मिटा देना चाहिए। जब संसार में कोई मूल्यवान बढ़िया वस्तु बनती है, तो उसके अनुरूप नाम से नकली वस्तु भी बाजार में बिकने आ जाती है। तब नकली वस्तु बनाने वाले नक्कालों से सावधान का विज्ञापन देकर लोगों को सावधान कर देते हैं। सबसे बड़ा खतरा यही है कि असली के धोखे में कहीं नकली वस्तु न खरीद ली जाय। शंकरजी का यही संकेत है।
........आगे कल .......
........आगे कल .......
Saturday, 4 July 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्............
भगवान राम ने शरणागति के संदर्भ में कहा है कि व्यक्ति कैसा भी रोगी क्यों न हो, वह अवश्य स्वथ्य हो जायेगा, पर रोग को दूर करने के लिए उसे कम से कम चार वस्तुओं को छोड़ना पड़ेगा। मेरी शरण में आने के पहले व्यक्ति को मद, मोह, कपट और छल छोड़ देना चाहिए। वैद्य के पास जाने की प्रक्रिया भी यही है। वैद्य के पास अगर व्यक्ति मद को लेकर जाय और यह सोचे कि मैं वैद्य की तुलना में अधिक योग्य हूँ, तब तो वैद्य की दी हुई औषधि और पथ्य पर उसका विश्वास ही नहीं होगा। इसलिए उसको पहले मद छोड़ना होगा। मान लिया कि मद नहीं है, पर यदि वह वैद्य के वचनों को सुनकर भी अपनी इच्छा के अनुकूल आचरण करने लगे, तो वह मोह की स्थिति होगी। फिर यदि वैद्य के पास पहुँचकर रोगी उसे अपने रोगों के विषय में भ्रांति में रखना चाहे, उससे छल-कपट करना चाहे तो इससे वह स्वयं ठगा जायेगा। इस प्रकार भगवान राम शरणागति के संदर्भ में जो बात कहते हैं, वह वैद्य के संदर्भ में भी सही है।
Friday, 3 July 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्................
जब गरूड़ भ्रमरोग से अस्वस्थ हुए थे, तब वैद्य ढूँढ़ने के लिए उन्हें कितनी यात्रा करनी पड़ी थी, इसका वर्णन उत्तरकाण्ड में मिलता है। न जाने कितने वैद्यों के पास वे भटके थे। गरूड़ की समस्या यह थी कि जिस वैद्य के पास वे जाते, वह उन्हें दूसरे वैद्य के पास जाने की सलाह देता था। जब वे प्रथम वैद्य नारद के पास पहुँचे, तो उन्होंने कहा, भई ! इस रोग की चिकित्सा मुझसे अच्छी तो ब्रह्माजी कर सकेंगे और जब वे ब्रह्माजी के पास पहुँचे, तो उन्होंने कहा - सबसे बड़े वैद्य तो शंकरजी हैं। उनके पास जाओ। जब वे तीसरे श्रेष्ठ वैद्य शंकरजी के पास गये, तो उन्होंने कहा, यदि तुम स्वस्थ होना चाहते हो, तो कौए के पास जाओ। अब नारद, ब्रह्मा और शंकरजी तो बड़े वैद्य थे, उनकी तुलना में काकभुशुण्डि अत्यंत सामान्य थे। तात्पर्य यह है कि किसी व्यक्ति को बड़ा गुरु, बहुत बड़े महापुरुष प्राप्त हो जाएँ तो मात्र उससे उसकी समस्या का समाधान नहीं हो जाता। उसके लिए यह जानना आवश्यक होता है कि स्वयं रोगी की स्थिति क्या है और किस प्रकार के वैद्य से उसको उसे लाभ होगा। इसलिए भगवान शंकर ठीक से निदान करके गरूड़जी को उचित वैद्य के पास भेजते हैं और तब कहीं उनका संशय का रोग दूर होता है।
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्...............
....पिछला से आगे .....
सती भगवान शंकर की प्रिय पत्नी हैं और भगवान शंकर आध्यात्मिक दृष्टि से वैद्य हैं। जैसे शरीर के रोगों को वैद्य दूर करता है, उसी प्रकार मन के रोगों को गुरु दूर करता है। अन्य गुरु तो कुछ लोगों के ही गुरु होते हैं, पर भगवान शंकर के बारे में कहा गया है कि वे त्रिभुवन-गुरु हैं। इसका अभिप्राय क्या है ? भले ही सती संसार के सर्वश्रेष्ठ गुरु की पत्नी थीं, पर बहुत बड़े गुरु के शिष्य हो जाने से ही रोग दूर नहीं हो जाता। सतीजी के संदर्भ में तो यह बड़े पते की बात है। वे अपने रोग को छिपाना चाहती हैं। भगवान शंकर जैसे वैद्य ने यह बताने की चेष्टा की कि तुम्हें रोग हो गया है। सतीजी का सौभाग्य यह था कि उन्हें ढूँढ़ने कहीं अन्यत्र नहीं जाना था। वैद्य तो साथ ही चल रहे थे। लेकिन संसार में, विशेषकर मानसिक रोगियों में, अपने रोग छिपाने की जो प्रवृत्ति बहुधा देखी जाती है, सतीजी उससे ग्रस्त हैं। वे भगवान शंकर से न तो अपने संदेह का वर्णन करती हैं, न ही अपने मोह तथा भ्रम की।
सती भगवान शंकर की प्रिय पत्नी हैं और भगवान शंकर आध्यात्मिक दृष्टि से वैद्य हैं। जैसे शरीर के रोगों को वैद्य दूर करता है, उसी प्रकार मन के रोगों को गुरु दूर करता है। अन्य गुरु तो कुछ लोगों के ही गुरु होते हैं, पर भगवान शंकर के बारे में कहा गया है कि वे त्रिभुवन-गुरु हैं। इसका अभिप्राय क्या है ? भले ही सती संसार के सर्वश्रेष्ठ गुरु की पत्नी थीं, पर बहुत बड़े गुरु के शिष्य हो जाने से ही रोग दूर नहीं हो जाता। सतीजी के संदर्भ में तो यह बड़े पते की बात है। वे अपने रोग को छिपाना चाहती हैं। भगवान शंकर जैसे वैद्य ने यह बताने की चेष्टा की कि तुम्हें रोग हो गया है। सतीजी का सौभाग्य यह था कि उन्हें ढूँढ़ने कहीं अन्यत्र नहीं जाना था। वैद्य तो साथ ही चल रहे थे। लेकिन संसार में, विशेषकर मानसिक रोगियों में, अपने रोग छिपाने की जो प्रवृत्ति बहुधा देखी जाती है, सतीजी उससे ग्रस्त हैं। वे भगवान शंकर से न तो अपने संदेह का वर्णन करती हैं, न ही अपने मोह तथा भ्रम की।
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्..........
यह रामचरितमानस क्या है ? चिकित्सा के संदर्भ में यदि हम देखें, तो इसमें विचित्र रोगियों का वर्णन किया गया है। उन रोगियों में कुछ ऐसे हैं, जो स्वथ्य हो जाते हैं और कुछ ऐसे भी हैं, जो स्वथ्य नहीं हो पाते। इन रोगियों के दृष्टान्तों के माध्यम से मानो यह बताया गया है कि किस प्रकार के व्यक्ति स्वस्थ होते हैं और किस प्रकार के रोगियों की अस्वस्थता दूर नहीं होती। जैसे सती हैं। उनके चरित्र में एक रोग उत्पन्न होता है और वह इस सीमा तक पहुँच जाता है कि उन्हें शरीर का परित्याग करना पड़ता है। पीलिया एक रोग है, जिसमें नेत्रों में पीलापन आ जाता है। जब यह रोग बहुत बढ़ जाता है, तब व्यक्ति को सारी वस्तुएँ पीली दिखाई देने लगती हैं। वस्तु तो ज्यों की त्यों होती है, पर आँखों का रंग बदल जाने से वस्तु भी बदली हुई दिखाई देती है। तो, सती के जीवन में ऐसे ही मानसिक पीलिया का जन्म होता है। वे वन में भगवान राम को सीता के वियोग में विलाप करते हुए देखती हैं और जब भगवान शंकर उन्हें ईश्वर और सच्चिदानन्द कहकर दूर से प्रणाम करते हैं, तो वे चकित हो जाती हैं, क्योंकि श्रीराम उन्हें अत्यंत साधारण व्यक्ति दिखाई पड़ते हैं। भगवान शंकर चाहते हैं कि सती का यह रोग किसी प्रकार दूर हो, पर उनके जैसे कुशल चिकित्सक के होने पर भी सती का रोग इस जन्म में दूर नहीं होता।
Wednesday, 1 July 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्..................
वैद्य नाड़ी के माध्यम से देखता है कि व्यक्ति के शरीर में पित्त, कफ अथवा वात में से कौन सी नाड़ी कुपित है। आयुर्वेदशास्त्र में नियम यह है कि उसमें रोगों की नहीं, रोगी की चिकित्सा की जाती है। इसका अर्थ यह है कि रोग की चिकित्सा करने से पहले रोगी की प्रकृति का ज्ञान प्राप्त किया जाता है। रामचरितमानस में भी आध्यात्मिक दृष्टि से व्यक्ति की जो चिकित्सा की गयी है, उसमें इसी पध्दति का पालन किया गया है। वैद्य पहले देखते हैं कि व्यक्ति की प्रकृति कौन सी है - वात की है अथवा पित्त की या कफ की, और उस पर ध्यान रखकर वे दवा देते हैं। ठीक इसी प्रकार मानवीय प्रकृति में भी विभिन्न प्रकार के दोष हैं, पर विभिन्न दोषों के होते हुए भी प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में किसी न किसी दोष की मुख्यता होती है। कई व्यक्तियों को क्रोध बहुत आता है, बहुतों के जीवन में कामवासना की प्रधानता दिखाई देती है, फिर बहुतों के जीवन में लोभ अत्यंत उग्र मात्रा में रहता है। इस प्रकार मानस की दृष्टि से व्यक्ति का विभाजन मूलतः तीन प्रकार से किया गया है। इन तीन प्रकार के व्यक्तियों में प्रकृति के विकृत होने पर अलग-अलग मानसिक रोगों का जन्म होता है। इसलिए यदि हम व्यक्ति की प्रकृति को पहले समझ लें, तो चिकित्सा सरल हो सकती है।
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्...............
प्राचीन और आधुनिक दोनों चिकित्सा - विज्ञानों में निदान को अत्यधिक महत्व दिया जाता है। निदान में रोग का पकड़ में आ जाना कल्याण का प्रथम सोपान है। यह बात मानस-रोगों पर भी लागू होती है। मानस-रोग का वर्णन सुनकर बहुधा जो श्रोता मुझसे मिलने के लिए आते हैं, वे बड़े घबराये से रहते हैं। वे मुझसे आग्रह करते हैं कि आप केवल रोग की वर्णन ही न करें, बल्कि उसकी दवा भी बताते चलें, पर मैं जिस पध्दति से इस प्रसंग में रोगों का वर्णन किया गया है, उसी के अनुरूप आपके सामने बात रख रहा हूँ। हम लोग पहले रोग का निदान ठीक कर लें, सही-सही अर्थों में यह समझ लें कि हमारे जीवन में कौन सी समस्या है तथा यह जान लें कि मन में जो रोग विद्यमान हैं, वे कैसे उदित होते हैं एवं उनकी प्रक्रिया कैसी है ?
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