Tuesday, 7 July 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्..............

हम लोग दूसरों का दोष बड़ी पैनी दृष्टि से देखते हैं। दूसरों के दोष देखने के लिए हमारी आँखें हजार की संख्या में हो जाती है, पर भगवान की दृष्टि क्या है ? वे भी नारद के दोष देखते हैं, पर उनकी दृष्टि वैद्य की है। वैद्य जब रोगी का दोष देखता है, तो उसका उद्देश्य रोगी की निन्दा करना नहीं होता, वरन रोगी के स्वास्थ्य को सुधारना होता है, पर जब कोई विरोधभाव से दूसरे व्यक्ति के दोषों को देखता है, तो उसमें शत्रु के प्रति कल्याण की भावना नहीं होती, वरन उसे प्रसन्नता होती है कि शत्रु में ये दोष विद्यमान हैं। रुद्रगणों ने अपनी पैनी दृष्टि का दुरुपयोग किया। उन्होंने द्वेष भाव से नारद का दोष देखा। परिणाम यह हुआ कि नारद तो शीघ्र स्वथ्य हो गये, पर इन दोषदर्शी रुद्रगणों को स्वथ्य होने में लम्बा समय लगा। ये ही आगे चलकर रावण और कुम्भकर्ण बने।

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