Sunday, 12 July 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्..............

मंथरा ने जब आकर कैकेयी को समाचार दिया कि कल राम को राज्य प्राप्त होने वाला है, तो कैकेयीजी के ह्रदय में कोई दुःख नहीं हुआ, न कोई जलन हुई, वरन प्रसन्न होकर बोली - मंथरा! तुमने इतना सुंदर समाचार सुनाया है कि यदि सचमुच कल राम को राज्य मिलने वाला है तो तुम जो माँगोगी वही मिलेगा। इससे लगता है कि कैकेयीजी में राजयक्ष्मा के कोई लक्षण नहीं है, पर यह बड़ी छूतवाली बीमारी है। मंथरा से थोड़ी देर उनका वार्तालाप हुआ नहीं कि मंथरा के मुँह से उनके कान में ऐसे कीटाणु पैठे कि वे राजयक्ष्मा से पुरी तरह ग्रस्त हो गयीं और दशरथजी से कह उठी कि भरत को राज्य दीजिए और राम को वन। इतना ही नहीं, वे कहती हैं - यदि प्रातःकाल होते ही राम राज्य छोड़कर वनवासी वेश में वन को नहीं जाते हैं तो समझ लीजिए! मेरी मृत्यु होगी और आपको कलंक प्राप्त होगा। तात्पर्य है कि कैकेयीजी में मंथरा के सारे लक्षण आ गये। मंथरा ने उन्हें ऐसी पट्टी पढ़ायी कि वे कहने लगीं, मंथरा ! क्या बताऊँ, मुझसे बड़ी भूल हो गयी, तुमको मैंने सदा अपने पैरों पर बिठाया, तुम आँखों की पुतली बनाकर रखने योग्य हो। और सचमुच मंथरा उसकी आँखों में ऐसी पैठी कि जो मंथरा देखती थी, कैकेयी को वही दिखाई देने लगा। इस प्रकार गोस्वामीजी एक सांकेतिक विवरण देते हैं कि मानसिक रोग का संक्रमण कैसे होता है।

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