रावण और कुम्भकर्ण मोह और अहंकार के प्रतीक हैं। मोह और अहंकार से ग्रस्त व्यक्ति सर्वदा दूसरों का ही दोष देखता है। ऐसा व्यक्ति स्वस्थ नहीं हो सकता। जब वह अपने को अस्वस्थ ही नहीं मानेगा तब स्वथ्य कैसे होगा? रावण और कुम्भकर्ण की सबसे बड़ी समस्या यह थी कि वे अपने आपको रोगी के रूप में नहीं देख पाते थे। मानवीय प्रवृत्ति भी ऐसी ही है। कथा में आकर लोगों की बुद्धि और पैनी हो जाती है, पर उस पैनी बुद्धि का सदुपयोग बहुत कम लोग ही करते हैं। इसका कई बार अनुभव होता है। कानपुर में एक दिन कथा में अहंकार की व्याख्या की गयी थी। कथा के पश्चात जब मैं लौट रहा था, तो तीन सदस्य गाड़ी में पीछे बैठे हुए थे और तीनों कथा से प्रभावित थे। पर वे किस रुप में प्रभावित थे यह समझने योग्य बात है। तीनों संवाद करते हुए दूसरे को ही कुम्भकर्ण बता रहे थे। अर्थात तीनों को यही लगा कि कथा मेरे लिए नहीं है, दूसरे के लिए है। किसी को यह प्रतीत नहीं हुआ कि अहंकार मुझमें है। प्रत्येक ने यही सोचा कि अहंकार दूसरे में है और उसे ही दूर करना है। इस वृत्ति से सावधान रहना चाहिए। यह रुद्रगणों वाली वृत्ति है। भगवान राम को रावण और कुम्भकर्ण के रूप में इन रुद्रगणों को मारना पड़ा था।
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