दशरथजी को दासियों ने सूचना दी कि कैकेयी कोपभवन में बैठी हुई हैं, अर्थात रूग्ण हैं। कैसा रोग ? गीता में कहा गया है - संग से काम का उदय होता है और काम से क्रोध का। तात्पर्य यह है कि मंथरा के संग से कैकेयी के भीतर भरत को राज्य दिलाने की कामना का उदय हुआ और उसमें राम को बाधक समझकर क्रोध उत्पन्न हो गया। इसलिए वे कोपभवन में बैठी हैं। उनका रोग क्रमशः वृद्धि की ओर जा रहा है। ऐसी दशा में महाराज दशरथ को चाहिए था कि वे कैकेयी के पास न जाकर लौट जाते और वैद्य को भेजते। वैद्य कौन है - गुरु वसिष्ठ। वे आकर कैकेयी की चिकित्सा करते, लेकिन महाराज दशरथ स्वयं कैकेयी के कोपभवन में चले जाते हैं। कैकेयी कोपभवन में है यह सुनकर राजा सहम गये। डर के मारे उनका पाँव आगे की ओर नहीं पड़ता। महान प्रतापी राजा दशरथ स्त्री का क्रोध सुनकर सूख गये। काम का प्रताप और महिमा तो देखिए। तात्पर्य यह है कि महाराज दशरथ के जीवन में अन्य दुर्बलताएँ नहीं थीं - उनमें लोभ नहीं था, क्रोध नहीं था तथा उनके चरित्र में अनेक बडे-बड़े सद्गुण थे, पर काम की दुर्बलता उनके जीवन में बीजरुप में विद्यमान थी। कैकेयी की सुन्दरता के प्रति वे मुग्ध थे। महाराज दशरथ कैकेयी को स्वथ्य बनाने में समर्थ नहीं हुए। परिणाम यह होता है कि कैकेयी की अस्वस्थता तो दूर होती नहीं, महाराज दशरथ मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं।
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