जीवन में यदि लोभ आ जाय तो इसका अभिप्राय है कि कफ बढ़ रहा है। शरीर में थोड़ा कफ रहे, यह उचित है, क्योंकि वह भी शरीर का एक भाग है, पर यदि कफ बढ़ने लगे, तो वह अस्वस्थता की निशानी है। जब कफ बढ़ने लगता है, वह ह्रदय को पूरी तरह से जकड़ लेता है, यहाँ तक कि साँस लेना भी कठिन हो जाता है। इसका अभिप्राय यह हुआ कि समाज में अगर लोकव्यवहार के लिए लोभ बना रहे तो अनुचित नहीं है, क्योंकि व्यक्ति जब जीवन को चलाने के लिए व्यापार करता है, नौकरी करता है, तो किसी न किसी सीमा तक उसे लोभ को स्वीकार करना ही पड़ता है। जिस प्रकार उचित परिमाण में कफ की मात्रा शरीर को स्वथ्य रखती है, उसी प्रकार धन का उपयोग परिवार, समाज तथा देश के लोक-हितकर कार्यों में होने से लोभ की सार्थकता होती है, लेकिन जैसे कफ का अतिरेक होने से ह्रदय जकड़ जाता है, उसी प्रकार लोभ का अतिरेक होने से ह्रदय कठोर हो जाता है, लोभरुपी कफ ह्रदय में ऐसे जम जाता है कि उसे निकालना कठिन हो जाता है।
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