अयोध्या में गुरु वसिष्ठ हैं। वे वैद्य हैं। पर वे भी अनुभव करते हैं कि मानस-रोग अयोध्या में इतना बढ़ गया है कि उसे दूर करना उनके द्वारा संभव नहीं है। तब एक दूसरे वैद्य बुलाए जाते हैं, जो रामायण के श्रेष्ठतम वैद्य हैं। मंथरा और कैकेयी के द्वारा जो रोग फैला दिया गया था, उसे वसिष्ठ जैसे वैद्य दूर करने में समर्थ नहीं थे। उसके लिए किसी और उत्कृष्ट वैद्य की आवश्यकता थी। वे थे श्रीभरतजी। भरतजी की चिकित्सा क्या थी ? वे सारे समाज को साथ लेकर चित्रकूट जाते हैं और वहाँ सबको भगवान राम से मिला देते हैं। भगवान राम का दर्शन प्राप्त करके लोग परम पद के अधिकारी बन जाते हैं, पर भरतजी के दर्शन का क्या फल होता है ? भरतजी के दर्शन से तो उनका भवरोग ही मिट गया। अयोध्या का अस्वस्थ समाज भरतजी के औषध से कैसे स्वथ्य होता है यह एक विश्लेषण का विषय है।
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