Thursday, 23 July 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्..............

सीताजी की खोज ही राम-काज है। हनुमानजी के चरित्र में राम-काज का यह महामंत्र बार-बार परिलक्षित होता है। जब वे सीताजी की खोज में चल पड़ते हैं तो रास्ते में मैनाक पर्वत पड़ता है। मैनाक ने कहा, यहाँ आकर थोड़ा विश्राम कर लो। हनुमानजी ने तुरन्त कहा - श्रीराम का कार्य किए बिना मुझे कोई विश्राम नहीं है। हनुमानजी जी जब आगे बढ़े तो सुरसा मिली। सुरसा ने कहा कि मुझे भूख लगी है, आकर मेरे मुँह में पैठ जाओ। हनुमानजी ने कहा कि नहीं, अभी नहीं। पहले श्रीराम का कार्य करके आ जाउँ। तात्पर्य यह है कि हनुमानजी के चरित में राम-काज को छोड़कर और कुछ नहीं है। और जब वे प्रभु का कार्य करके लौटते हैं, तो प्रत्येक बंदर को यह सोचकर धन्यता का अनुभव होता है कि हनुमानजी भगवान राम का कार्य करके लौटे हैं। फिर इसके पश्चात लंका में राक्षसों से युद्ध होता है। तात्पर्य यह है कि सीताजी को, भक्तिदेवी को पाने के लिए राक्षसों से अर्थात दुर्गुणों से लड़ना होगा।

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