Thursday, 9 July 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्.............

रामचरितमानस में भिन्न-भिन्न पात्रों के संदर्भ में उनकी अलग-अलग प्रकृति का संकेत देते हुए रोगों का विस्तृत विवेचन किया गया है। यह जो अयोध्याकांड है, वह पूरा आयुर्वेद का चिकित्सा -शास्त्र ही है। इसमें आप देखेंगे कि अलग-अलग व्यक्ति किस प्रकार रूग्ण होते हैं - चाहे वह मंथरा हो या कैकेयी अथवा महाराज श्री दशरथ। रामायण के ये दृष्टांत मानो हमें यह बताने के लिए हैं कि हम इन पात्रों के संदर्भ में यह देखने की चेष्टा करें कि किस पात्र से हमारी प्रकृति मिलती-जुलती है और वह पात्र किस प्रकार स्वस्थ हुआ, तथा यदि नहीं हुआ तो क्यों नहीं हुआ। उससे आप मानसिक रूप से स्वस्थ होने का उपाय देख पायेंगे। अयोध्याकांड के प्रारंभ में हम संकेत पाते हैं कि अयोध्या में बड़े संत, बड़े सच्चरित्र पुरुष थे। साथ ही यह भी कि अगर समाज में सौ व्यक्ति भले हों और एकाध व्यक्ति बुरा हो तो यह सोचकर हमें निश्चिंत नहीं हो जाना चाहिए कि एक व्यक्ति के बुरे होने से समाज पर कोई बुरा प्रभाव नहीं पड़ेगा। समाज में यदि एक व्यक्ति भी अस्वस्थ होगा तो वह दूसरे व्यक्ति को भी अस्वस्थ बना सकता है।

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