Wednesday, 22 July 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्...........

सुग्रीव किष्किन्धा का सिंहासन पाकर प्रारंभ में काम-काज और राम-काज दोनों ही कार्यों में अनुत्तीर्ण हो जाते हैं। उन्होंने राम-काज की ओर तो ध्यान दिया ही नहीं, बल्कि बहुत दिनों तक भोगों से दूर होने के कारण भोगों में ऐसे लिप्त हुए कि राज-काज भी भूल गये। यह भी भूल गये कि अंगद के प्रति ऐसा व्यवहार न हो कि प्रभु रुष्ट हो जाएँ। सुग्रीव काम-रस में डूबकर भक्ति के मूल श्रीराम को भूल गये। जीवन में सब कुछ पाकर व्यक्ति के जीवन में ईश्वर के प्रति भक्ति आनी चाहिए, कृतज्ञता का भाव आना चाहिए, पर सुग्रीव के साथ सब उलटा होता है। जीव की दशा सुग्रीव की दशा जैसी है। वह ईश्वर की दी हुई भेंटों को स्वीकार तो कर लेता है, पर भोगों में डूबकर उन्हें भूल जाता है। जब व्यक्ति भगवान के किये गये उपकारों को भुलाकर भोग में डूब जाता है तब भगवान काल का स्मरण करते हैं। यह काल ही श्रीराम का, ईश्वर का, धनुष है और घण्टा, दिन, महीना, वर्ष, युग और कल्प के रूप में समय का जो विभाजन है वही उनका बाण है। तात्पर्य यह है कि कालरुपी धनुष से समयरूपी बाण चल रहा है और लोग नाश को प्राप्त हो रहे हैं।

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