Monday, 20 July 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्.................

व्यवहार में प्रश्न किया जाता है कि मनुष्य काम-काज करे कि राम-काज, अर्थात जीवन के कार्यों का निर्वाह करे अथवा भगवान की भक्ति करे ? इससे ऐसा लगता है कि काम-काज और राम-काज में विरोध है। इसका उत्तर हमें रामचरितमानस में मिलता है। भगवान राम ने जब बालि का वध किया तो उसके पश्चात सुग्रीव को तुरंत यह आदेश नहीं दिया कि तुम सीता का पता लगाओ। सीताजी मूर्तिमती भक्ति हैं और भक्ति प्राप्त करना जीवन का चरम लक्ष्य है। श्रीराम बालि का वध करके सुग्रीव को सिंहासन पर बिठाकर कह सकते थे कि अब सीताजी की खोज में लग जाओ, पर वे वैसा नहीं कहते। वे जानते हैं कि किसके चरित्र का विकास कैसे होगा ? वे सुग्रीव से कहते हैं - तुम काम-काज करो अर्थात राज्य करो। साथ ही श्रीराघवेन्द्र एक महामंत्र यह भी देते हैं कि राजकार्य के साथ एक कार्य और करना है - ह्रदय में मेरे कार्य का सदा ध्यान रखना। राज-काज में राम-काज को मत भूल जाना। वस्तुतः जिसे हम राम-काज कहते हैं, वह भी जीव का ही काज है। अब आप विचार करके देखिए - यह जो सीताजी की, भक्ति या शांति की उपलब्धि है, वह तो जीव के स्वयं के लिए कल्याणकारी है। यदि हम भक्ति या शांति की खोज में चलते हैं, तो उससे हम ईश्वर पर उपकार नहीं करते, पर ईश्वर इतने उदार हैं कि कहते हैं कि सीताजी का पता लगाना मेरा कार्य है, इसलिए राज-काज के साथ मेरे कार्य का भी ध्यान रखना।

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