कई महापुरुष अन्तर्मुखी होते हैं। वे अपने आनन्द में डूबकर आनन्द के उत्स को प्राप्त करना चाहते हैं और इसमें वे सफल भी होते हैं, परन्तु उनकी अन्तर्मुखता से दूसरों की समस्याओं का समाधान नहीं होता। भगवान शंकर के संदर्भ में यही बात कही जा सकती है। उन्हें सुख पाने के लिए पत्नी की आवश्यकता नहीं है। वे पूरी तरह से अन्तर्मुखी हैं। उनकी अन्तर्मुखता उन्हें पूर्ण आनंद प्रदान कर रही है, पर सारा समाज तथा स्वयं पार्वतीजी उन्हें पाने के लिए प्रयत्नशील हैं। भगवान राम यहाँ पर भी एक सामंजस्य स्थापित करते हैं। अभी तक शिवजी नेत्र मूँदकर समाधि की अवस्था में भगवान राम का दर्शन कर रहे थे। अब भगवान राम उनके सम्मुख प्रकट हो गये। इसके माध्यम से उन्होंने दर्शाया कि मैं भीतर ही नहीं वरन बाहर भी हूँ। वे शंकरजी को अन्तर्मुखता त्यागकर बाहर आने के प्रेरित करते हैं।
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