व्यक्ति दो प्रकार के होते हैं- एक को सामीप्य में अधिक रसोत्पत्ति होती है और दूसरे को सामीप्य में धीरे - धीरे रसाभास हो जाता है। यही हनुमानजी और अंगद के स्वभाव की भिन्नता है। हनुमानजी ऐसे हैं कि समीप रहकर भी उनकी रसानुभूति में कमी नहीं आती, बल्कि बढ़ती ही रहती है, जबकि अंगद के जीवन में यह संभावना अधिक है कि वे ईश्वर से दूर रहकर उनके रस की स्मृति में अधिक डूबेंगे। इसलिए भगवान राम उन्हें लौटा देते हैं और इस प्रकार श्री राघवेन्द्र काम-काज और राम-काज में एक व्यवहारगत तथा चरित्रगत सामंजस्य प्रस्तुत कर जीव की मनोग्रन्थि का छेदन करते हैं।
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