Friday, 10 July 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्............

शरीर के रोगों के संबंध में नियम मन के रोगों के संबंध में भी सत्य है। जिन लोगों के जीवन में मानसिक रोग होते हैं, वे अपने सम्पर्क के द्वारा दूसरों के मन में भी रोग के कीटाणु पैठाकर उनको अस्वस्थ बना देते हैं। आप देखेंगे, अयोध्या में सब स्वस्थ व्यक्ति थे, केवल एक ही व्यक्ति अस्वस्थ मन वाला था। वह थी मंथरा। उसे क्या रोग था ? गोस्वामीजी इसे मानस-रोग के संदर्भ में कहते हैं - दूसरे के सुख को देखकर जो जलन होती है, वह राजयक्ष्मा रोग है। मंथरा को यही रोग हो गया है। उसे सूचना मिली कि कल श्री रामचंद्र का राजतिलक होने जा रहा है, यह सुनकर उसका ह्रदय जल उठा। मानो उसे मानसिक राजयक्ष्मा रोग हो गया। वह यह राजयक्ष्मा लेकर कैकेयी के पास जाती है। कैकेयीजी को देखने से लगता है कि वे स्वस्थ हैं, उनमें कोई दुर्बलता नहीं है, पर वे रोगशून्य नहीं थीं। मंथरा ने उस रोग को उभाड़ दिया।

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