...........कल से आगे .....
राम और काम में ऐसी कुछ समानताएँ हैं कि व्यक्ति सुख पाने के लिए काम का वरण कर लेता है। काम उसे सस्ते में सुख दिलाने का दावा करता है और साधक के मन में सरल और छोटे मार्ग से सुख पाने की इच्छा जाग्रत हो जाती है। इसका सांकेतिक तात्पर्य क्या है? वह यह है कि व्यक्ति में मिलन की तीव्र आकांक्षा होती है, क्योंकि अंश का स्वभाव है पूर्ण को पाना। जीव की सहज प्रवृत्ति है कि वह पूर्ण से मिलना चाहता है, पर काम इस मिलन की आकांक्षा को दूसरी दिशा में मोड़कर यह दिखाने की चेष्टा करता है कि तुम्हारी मिलन की आकांक्षा को हम इसी मृत्यु -लोक में पूरी कर सकते हैं। काम का सारा मनोविज्ञान इतना अनोखा है कि व्यक्ति धोखे में आ जाता है। शंकरजी द्वारा काम को जला देने का तात्पर्य यह है कि कम से कम इतना भेद तो रहे कि राम रूपवाले हैं तो काम बिना शरीर वाला रहे, जिससे साधक दोनों का अन्तर समझ सके। इतना अन्तर डालकर उन्होंने काम को जीवित कर दिया और कहा कि तुम अनंग होकर जीवित रहो।
राम और काम में ऐसी कुछ समानताएँ हैं कि व्यक्ति सुख पाने के लिए काम का वरण कर लेता है। काम उसे सस्ते में सुख दिलाने का दावा करता है और साधक के मन में सरल और छोटे मार्ग से सुख पाने की इच्छा जाग्रत हो जाती है। इसका सांकेतिक तात्पर्य क्या है? वह यह है कि व्यक्ति में मिलन की तीव्र आकांक्षा होती है, क्योंकि अंश का स्वभाव है पूर्ण को पाना। जीव की सहज प्रवृत्ति है कि वह पूर्ण से मिलना चाहता है, पर काम इस मिलन की आकांक्षा को दूसरी दिशा में मोड़कर यह दिखाने की चेष्टा करता है कि तुम्हारी मिलन की आकांक्षा को हम इसी मृत्यु -लोक में पूरी कर सकते हैं। काम का सारा मनोविज्ञान इतना अनोखा है कि व्यक्ति धोखे में आ जाता है। शंकरजी द्वारा काम को जला देने का तात्पर्य यह है कि कम से कम इतना भेद तो रहे कि राम रूपवाले हैं तो काम बिना शरीर वाला रहे, जिससे साधक दोनों का अन्तर समझ सके। इतना अन्तर डालकर उन्होंने काम को जीवित कर दिया और कहा कि तुम अनंग होकर जीवित रहो।
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