Monday, 29 February 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

भगवान राम को श्रीसीताजी कैसे मिलीं ? नवधाभक्ति में पहला सूत्र है -
       'प्रथम भगति संतन्ह कर संगा।'
और जब लक्ष्मणजी ने अरण्यकाण्ड में भगवान राम से पूछा कि महाराज ! आपकी भक्ति कैसे मिलती है ? तो भगवान राम ने भक्ति का सूत्र देते हुए कहा -
       भगति तात अनुपम सुखमूला।
       मिलइ जो संत होइँ अनुकूला।।
भक्ति समस्त सुखों का केंद्र है, किन्तु बिना संतकृपा के भक्ति प्राप्त नहीं होती । भगवान राम को श्रीसीताजी कहाँ मिलीं ? पुष्पवाटिका में । यही संतकृपा का सूत्र है । अगर महर्षि विश्वामित्र श्रीराम को फूल चुनने पुष्पवाटिका में न भेजते, तो उन्हें श्रीसीताजी का साक्षात्कार नहीं होता । इसलिए संत ही भक्ति की प्राप्ति में मूल प्रेरक हैं । भगवान श्रीराम अपनी लीला के माध्यम से हमें यह बता देना चाहते हैं कि संत के बताए मार्ग से चलकर ही भक्ति की प्राप्ति होती है ।

Sunday, 28 February 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ............

रामचरितमानस में ज्ञान और भक्ति दोनों के ही सूत्र हैं । पुष्पवाटिका में सीताजी को श्रीराम की प्राप्ति होती है और श्रीरामचन्द्र को श्रीसीता की । आध्यात्मिक दृष्टि से इसका क्या तात्पर्य है ? भगवान राम साक्षात अखण्ड ज्ञानघन हैं और श्रीसीताजी हैं मूर्तिमती भक्ति । श्रीसीताजी ने भगवान राम को पाया, मानो श्रीसीताजी ने अपने चरित्र के माध्यम से ज्ञान को प्राप्त करने की पद्धति बतायी और भगवान राम ने श्रीसीताजी को पाया, मानो उन्होंने हम संसार के जीवों के सामने वह उपाय या साधना-पद्धति प्रस्तुत की, जिससे भक्ति प्राप्त होती है ।

Saturday, 27 February 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........

शरीर के रोगों के संदर्भ में रोगी को जैसे वैद्य के द्वारा बताए गए औषध और पथ्य को स्वीकार करना पड़ता है, इसी प्रकार साधक को भी सद्गुण और सत्कर्म का औषध-पथ्य स्वीकार करना पड़ता है, परन्तु मन के रोगों के संदर्भ में गोस्वामीजी इतना और जोड़ देते हैं कि साधक के जीवन में साधना की स्वीकृति तो अवश्य है, किन्तु ये रोग साधना अथवा प्रयत्न से दूर नहीं हो सकते । कहीं वह यह समझने की भूल न कर बैठे कि मैं अपने प्रयत्न से इन रोगों को दूर कर लूँगा । वे साधक को सावधान कर देते हैं । 'ज्ञानदीपक' प्रसंग में ज्ञान का दीपक जलाना मुख्य रूप से पुरूषार्थ का कार्य है । व्यक्ति को ज्ञान पुरूषार्थ के द्वारा प्राप्त होता है, लेकिन गोस्वामीजी ने ज्ञान-दीपक प्रसंग का प्रारंभ भी कृपा से ही किया । ज्ञान की प्राप्ति कैसे होगी ? इसके उत्तर में वे कहते हैं कि जब ह्रदय में सात्त्विक श्रद्धा आ जाय । यह सात्त्विक श्रद्धा कैसे आयेगी ? गोस्वामीजी एक सूत्र देते हैं -
     सात्त्विक श्रद्धा धेनु सुहाई ।
     जौं हरि कृपाँ ह्रदयँ बस आई।।
अतः व्यक्ति चाहे जितना भी सत्कर्म क्यों न करे ? चाहे जितना विचार भी क्यों न करे। उसके मूल में भगवान की कृपा ही विद्यमान है । वे यही कहते हैं कि भगवान की कृपा से ही मन के रोग दूर होते हैं, लेकिन साथ ही साथ यह भी कह देते हैं कि 'जौं एहि भाँति बनै संजोगा'। और फिर वे क्रम बताते हैं -
      सद्गुर बैद बचन विश्वासा ।
      संजम यह न विषय के आसा ।।
      रघुपति भगति सजीवन मूरी ।
      अनूपान श्रद्धामति पूरी ।।
      एहि बिधि भलेंहि सो रोग नसाहीं ।
      नाहिं त जतन कोटि नहिं जाहिं ।।

Friday, 26 February 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ..........

किसी के लोभ-रोग की चिकित्सा करना हो, तो उसे दान की औषध दी जाती है । काम-रोग को दूर करने के लिए ब्रह्मचर्य की दवा दी जाती है । क्रोध की दवा है क्षमा । लेकिन समस्या यह भी है कि जहाँ इन औषधियों के द्वारा रोगों का उपशमन होता है, वहीं एक रोग ऐसा भी है, जिसमें इस चिकित्सा से वृद्धि हो जाती है । कौन-सा रोग है ? अंहकार ही वह रोग है । सत्कर्म के द्वारा जब हम किसी पाप पर विजय प्राप्त करते हैं, तब हमारे मन में धर्माभिमान की वृत्ति आ जाती है । यह एक बहुत बड़ी समस्या है । तो ऐसा कौन-सा उपाय है कि रोग भी दूर हो जाय और अभिमान भी न हो ? गोस्वामीजी मानस-रोगों की चिकित्सा का प्रारंभ ही यहीं से करते हैं - भगवान की कृपा से ही रोग दूर होते हैं और कर्त्तृत्व का अभिमान भी दूर हो जाता है । सत्कर्म तो जीवन में करना ही चाहिए, किन्तु यही भी जान लेना होगा कि केवल पुरूषार्थ से रोग दूर नहीं होंगे, वह तो भगवान की कृपा से ही दूर होंगे ।

Thursday, 25 February 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच...........

सुग्रीव के चरित्र में दुर्बलताएॅ अवश्य हैं, किन्तु उसके साथ ही उसमें एक विशेषता है । छल और कपट की वृत्ति उनमें बिल्कुल नहीं है । वे बड़े सरल हैं, भगवान के सामने अपनी सारी दुर्बलताओं को प्रकट करते हुए वे बड़े स्पष्ट शब्दों में कह देते हैं - महाराज ! इन बुराइयों का नाश व्यक्ति के पुरूषार्थ से नहीं होता है । यह आपकी कृपा से ही दूर होता है । रोगी ने तो अपना रोग बता दिया, अब इसके आगे वैद्य की भूमिका है । रोगी को स्वस्थ बनाना वैद्य का काम है । वैसे रोगी का भी यह कर्तव्य है कि वह वैद्य द्वारा दी गई दवा तथा पथ्य का सेवन करे । इतना सहयोग तो उसे करना होगा । अभिप्राय यह है कि जब हमें सद्गुण की औषध और सदाचार का पथ्य दिया जाय, तो हमें सच्चाई के साथ उसका सेवन करना चाहिए । इससे निश्चित रूप से मन के बहुत से रोग दूर हो सकते हैं या उनका उपशमन हो सकता है ।

Wednesday, 24 February 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ..........

एक पद में गोस्वामीजी ने भगवान से कहा - आप प्रसन्न होकर मुझ पर कृपा करें । प्रभु ने कहा - किस विशेषता पर प्रसन्न होकर करूँ ? गोस्वामीजी ने कहा कि गुण तो मुझमें हैं ही नहीं, सब दोष ही दोष हैं और गिनाने लग गये । प्रभु बोले - इन सब दोषों को देखकर भला कौन प्रसन्न होगा ? उन्होंने कहा कि आप चाहें तो एक बात पर प्रसन्न हो सकते हैं । किस बात पर ? इस बात पर कि सब दोष होते हुए भी मैंने कुछ छिपाया नहीं, सब कुछ कह दिया । अच्छा! अब चाहते क्या हो ? गोस्वामीजी ने कहा कि प्रभो ! मैं अपने दोषों से हार गया हूँ, अब तो आप ही इन्हें दूर कर सकते हैं, आप मुझे इन दोषों से मुक्त कीजिए । यही साधक की वृत्ति है । इसका अभिप्राय यह है कि साधक अपने अन्तर्मन के दोषों को देखे और सरल तथा निष्कपट भाव से उन दोषों को प्रभु के चरणों में निवेदित कर दे । इससे उसके मन में भगवान के प्रति प्रगाढ़ भक्ति, विश्वास और आस्था बनी रहेगी कि यद्यपि मुझमें दोष है, पर भगवान की भक्ति और उनकी कृपा से मेरे सारे दोष दूर हो जायेंगे ।

Tuesday, 23 February 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ...........

...कल से आगे .......
शरीर चिकित्सा विज्ञान में आजकल जैसे अणुवीक्षण यंत्र के द्वारा परीक्षा करने की यह शैली साधकों की परम्परा में प्राचीनकाल से चली आ रही है । उनके पास भी एक अणुवीक्षण यंत्र है । कौन-सा ? वह यंत्र है मन की अन्तर्मुखता और एकाग्रता । अन्तर्मुखी मन जब एकाग्र होकर अपने दोषों को देखता है तो उसे अपने राई के बराबर दोष भी पहाड़ सरीखे दिखने लगते हैं । वही यंत्र लेकर गोस्वामीजी अपने दोषों को देखते हैं । अपने अन्तःकरण - 'मन,बुद्धि, चित्त और अहंकार ' एक-एक को बड़ी बारीकी से देखते हैं, उन्हें कई गुना बढ़ाकर देखते हैं, जो दोष सामान्यतया पकड़ में नहीं आते, उन्हें पकड़ते हैं और भगवान से कहते हैं - प्रभो ! मुझमें इतने बड़े-बड़े दोष हैं, मैंने इतने अपराध किये हैं । इनका दण्ड तो मुझे मिलना ही चाहिए । कौन-सा अपराध ? वे प्रभु की कृपा याद करते हुए कहते हैं - माता-पिता के रूप में आपने मुझे जन्म दिया, लालन-पोषण किया और मैं कितना कृतघ्न हूँ कि आपकी इस कृपा को भूलकर संसार में डूब गया । जब मेरी दृष्टि इस ओर जाती है, तब मुझे लगता है कि इन अपराधों के कारण क्यों न मुझे यमयातना में डाल दिया जाय ? किन्तु अपनी इस प्रार्थना का समापन वे कहाँ करते हैं ? कहते हैं कि प्रभो ! मैं जानता हूँ कि आप मेरी इस प्रार्थना को स्वीकार नहीं कर सकेंगे । क्यों ? कहते हैं - प्रभो ! मैं समझ गया, भले ही मैं अपने दोष आपसे कहूँ ! किन्तु आपका स्वभाव ऐसा है कि इतने पर भी आप मेरा हित ही करने आये हैं, कर रहे हैं और आप अपने इस स्वभाव को छोड़ नहीं सकते, इसलिए आगे भी करते रहेंगे ।

Monday, 22 February 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

गोस्वामीजी विनयपत्रिका के एक पद में भगवान से प्रार्थना करते हैं - "कीजै मोको जमजातनामई" । यह पहला वाक्य है, यहाँ से प्रारंभ करते हैं कि प्रभो ! मुझे यमयातना में डाल दीजिए । नरक में भी जो सबसे भीषण यातना होती है, उसे यमयातना कहते हैं । कई लोग तो डर के मारे नहीं पढ़ते होंगे । कहाँ तो हम भगवान से सुख, सम्पत्ति माँग रहे हैं, और कहाँ तुलसीदासजी कह रहे हैं कि हमें नरक में डाल दीजिए । भगवान से प्रार्थना नरक से छुड़ाने के लिए की जाती है कि नरक में डालने के लिए ? लेकिन इस पद की विशेषता क्या है ? जिस समय वे कहते हैं कि मुझे नरक में डाल दीजिए, उस समय उनकी वृत्ति क्या है ?  वे अपने रोगों के एक-एक लक्षण बड़ी बारीकी से देख रहे हैं । शरीर के संदर्भ में जैसे अणुवीक्षण यंत्र के द्वारा रोगाणुओं को हजारों गुना बढ़ाकर उसे बड़ी सूक्ष्मता से निरीक्षण किया जाता है, उसी तरह मन के रोगों में भी गोस्वामीजी की दृष्टि की विशेषता यही है कि वे अपने दोषों को इतना बड़ा बनाकर देखते हैं कि ताकि उन्हें पूरी तरह समझ लेने में कोई कमी न रह जाए ।
        ......आगे कल ......

Sunday, 21 February 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ..........

विनयपत्रिका मानस-रोगों की चिकित्सा का परिपूर्ण विज्ञान है । उसमें एक ओर तो जहाँ रोगों के लक्षण, उनका सूक्ष्म विश्लेषण तथा निदान प्रस्तुत किया गया है, वहीं उनकी सटीक चिकित्सा तथा अचूक औषध का निर्देश भी है, किन्तु उसे समग्र रूप से न पढ़कर यदि केवल रोग के लक्षण को पढ़ ले और वे लक्षण स्वयं उसके जीवन में दिखाई दे जाय, तो हो सकता है कि इससे उनके अन्तःकरण में भय, आतंक तथा निराशा का उदय हो, किन्तु विनयपत्रिका के उन पदों को यदि हम आदि से अंत तक पढ़ें, तो देखेंगे कि दैन्य से प्रारंभ होने पर भी पदों की समाप्ति नैराश्य में नहीं, बल्कि एक ऐसी परिपूर्णता, एक ऐसी आस्था तथा विश्वास में होती है, जहाँ सारे रोगों का समूल नाश होता है तथा पूर्ण स्वस्थता का लाभ होता है । गोस्वामीजी की विनयपत्रिका पठनीय है । यह साधकों के लिए एक श्रेष्ठ ग्रंथ है । इसमें गोस्वामीजी की एक विशिष्ट शैली है ।

Saturday, 20 February 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........

गोस्वामीजी विनयपत्रिका में जब अपने दोषों का विश्लेषण करते हैं, तब उसके साथ-साथ भगवान के गुणों का भी वर्णन करते हैं । उससे अन्तर्मन में रस की अनुभूति होती है । जैसे आयुर्वेद में असाध्य रोगों में रस का प्रयोग किया जाता है, उसी तरह मन के रोगों के लिए भगवान की भक्ति तथा उनका गुणगान ही भक्तिरस है । इस भक्ति के रस की विशेषता यह है कि इससे निराशा के स्थान पर आशा तथा दैन्य के स्थान पर प्रभु के गुणों का संचार होता है । इससे दोष दूर होते हैं, रोग छूट जाता है । नैराश्य और दैन्य दूर होकर ह्रदय भक्तिरस से भर जाता है । विनयपत्रिका की सबसे बड़ी विशेषता यही है ।

Friday, 19 February 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच............

सुरदासजी का एक प्रसिद्ध आख्यान है । सुरदासजी में दैन्य की पराकाष्ठा थी । एक बार वल्लभाचार्यजी से उनकी भेंट हुई । वल्लभाचार्यजी ने उनसे कहा - कुछ सुनाइए । सुरदासजी ने बड़े दीनतापूर्ण शब्दों में सुनाया - 'मो सम कौन कुटिल खल कामी' । उस पद में उन्होंने अपने दोषों का बड़े विस्तार से वर्णन किया । तब आचार्यजी ने क्या किया ? उन्होंने अनुभव किया कि इनका दैन्य अब चरम सीमा तक पहुँच चुका है । अगर ये इस दैन्य में ही लगे रहेंगे, निरन्तर अपने दोषों का ही चिन्तन करते रहेंगे तो दोषों में डूब जायेंगे । इसलिए उन्होंने कहा - अरे ! कुछ भगवान के गुण सुनाओ ! अभिप्राय यह है कि स्वदोष चिन्तन तो रोग का ज्ञान है और भगवान के गुणों का चिन्तन उस रोग की दवा है । स्वदोष चिन्तन के साथ अगर भगवान के गुणों का चिन्तन है, तब तो वह कल्याणकारी है, किन्तु अगर केवल दोष का चिन्तन हो रहा हो और भगवान के गुणों की दवा साथ न हो तो नि:संदेह ऐसा रोगी रोग की असाध्य अवस्था में पहुँचकर आतंकित हो जायेगा ।

Thursday, 18 February 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ..........

साधक के जीवन में स्वदोष दर्शन से जो दीनता की वृत्ति आती है, वह साधक को विनत होकर सद्गुरु-वैद्य के पास जाने की, साधना अथवा चिकित्सा के लिए प्रस्तुत होने की प्रेरणा देने वाली हो, न कि आत्महत्या की । साधक के दैन्य का अभिप्राय है - अभिमान शून्यता, निष्कपटता । यह न होकर दीनता अगर साधक के जीवन में आत्मघाती प्रवृत्ति की सृष्टि करे, तब तो वह रोग से भी अधिक घातक है । यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण सूत्र है । इसे अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि कहीं हम उलटा पाठ न पढ़ लें । दोष को जान लेना और उसे दूर करने का प्रयत्न करना ही साधक वृत्ति है ।

Wednesday, 17 February 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ..........

शरीर के समान ही मन के संदर्भ में भी व्यक्ति को जब अपने रोगों का ज्ञान होता है, तब उसके अन्तःकरण में बड़ी व्याकुलता होती है, लेकिन यहाँ भी बड़ी सावधानी की आवश्यकता होती है और वह यह है कि रोग का ज्ञान हो जाने के बाद व्यक्ति अगर चौबीसों घण्टे रोग का ही चिन्तन करता रहे कि हाय मुझे यह कैसा रोग हो गया, साँप के काट लेने पर यदि कोई व्यक्ति इतना अधिक आतंकित हो जाय कि दवा करने के बजाय केवल यही कल्पना करता रहे कि अब तो मैं बचूँगा नहीं । तो उसका परिणाम क्या होगा ? यही कि वह विष से मरने के स्थान पर आंतक से पहले ही मर जायेगा । अभिप्राय यह है कि न जानना तो घातक है ही किन्तु जानने का अतिरेक भी उचित नहीं है । उचित तो यही है कि व्यक्ति अपने रोग को जाने और उस रोग निवारण का उपाय करे । जैसे हम रोग को जान लेने के बाद डॉक्टर या वैद्य का आश्रय लेते हैं और उसके बताये हुए पथ्य या दवा का सेवन करके प्रसन्न होते हैं कि अच्छा हुआ कि समय पर हमें रोग का ज्ञान हो गया, अब चिकित्सा और पथ्य के द्वारा मैं स्वस्थ हो जाऊँगा । इस तरह से रोग के साथ यदि रोगी के मन में स्वस्थता की वृत्ति का उदय हो तब तो वह रोग का ज्ञान कल्याणकारी है, किन्तु इसके विपरीत यदि वह केवल भय और आंतक की सृष्टि करे तो वह रोग का ज्ञान कल्याणकारी नहीं है ।

Tuesday, 16 February 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ............

विनयपत्रिका में एक बड़ी मधुर बात कही गई है । कोई प्रश्न करता है कि अपने अनुभव को प्रमाण मानें या आपके शब्दों को ? उन्होंने पूछा - क्यों ? बोले - यदि कोई वस्तु मीठी लग रही हो और कहीं व्याख्यान से सुनने को मिले कि वह कड़वी है, तो प्रमाण हम अपने जीभ को मानेंगे या उस भाषण को ? गोस्वामीजी ने कहा कि व्यक्ति का अनुभव तो बड़ा महत्वपूर्ण होता है, लेकिन कभी-कभी तो ऐसा अनुभव होना सावधान करने के लिए होता है । उन्होंने इसका एक सुंदर दृष्टांत दिया कि जैसे अंधेरे में अगर कोई जन्तु काट ले और मन में संदेह हो कि कहीं साँप आदि किसी जहरीले जन्तु ने तो नहीं काट लिया ? तो उसकी परीक्षा करने के लिए एक पद्धति यह है कि जिस व्यक्ति को जन्तु ने काटा है उसका व्यक्ति को नीम की पत्तियाँ खिलायी जाती हैं । यदि नीम की पत्तियाँ उसे कड़वी लगे तो लोग प्रसन्न हो जाते हैंं कि उसे जहरीले साँप ने नहीं, बल्कि चूहे आदि ने काटा होगा, लेकिन वह व्यक्ति यदि कहने लगे कि नीम की पत्ती मीठी लग रही है, तो इस अनुभूति से न तो रोगी प्रसन्न होता है न ही परीक्षा करने वाले । क्योंकि मान्यता यह हैंं कि जब किसी व्यक्ति को साँप काट लेता है और उसका विष शरीर में फैल जाता है, तब उस व्यक्ति को नीम की पत्ती कड़वी नहीं, मीठी लगती है । अतः नीम की पत्ती कड़वी लगने के स्थान पर मीठी लगने से जैसे व्यक्ति स्वयं और अन्य लोग भी समझ लेते हैं कि इसे किसी विषैले सर्प ने काट लिया है, अब इसकी चिकित्सा होनी चाहिए । गोस्वामीजी कहते हैं कि इसी प्रकार इस संसार का विषय भी नीम के पत्ते के समान कड़वा है । अब यह कड़वा विषय अगर आपको मीठा लग रहा है तो सिर्फ मिठास की अनुभूति से आप प्रसन्न न हों, इसे आप सत्य प्रमाण नहीं मानें, बल्कि इससे आप निश्चित समझ लीजिए कि आपको काम-सर्प ने डस लिया है ।

Monday, 15 February 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........

रामचरितमानस में जीवों का जो विभाजन किया गया है - विषई साधक सिद्ध सयाने । - विषयी होना जीव की पहली श्रेणी है । विषयी वह है जो विषय में सुख अनुभव कर रहा है । साधक दूसरी श्रेणी का जीव है । साधक वह है जिसे विषय प्राप्त होने पर भी उसमें सुख के स्थान पर दुख की ही अनुभूति होती है । यही साधक का लक्षण है और यहीं से साधना प्रारंभ होती है । इस दुखानुभूति के बिना साधना प्रारंभ ही नहीं हो सकती । अभिप्राय यह है कि व्यक्ति के जीवन में साधना का श्रीगणेश तभी होगा, जब उसे अपनी त्रुटियों, दोषों और रोगों का ज्ञान होगा । तब स्वाभाविक रूप से उसके अन्तःकरण में दुख की अनुभूति होगी, विषयों के कड़वेपन की अनुभूति होगी । बिना इस अनुभूति के कोई व्यक्ति साधक नहीं हो सकता ।

Sunday, 14 February 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ..........

अपने दोष या रोग का ज्ञान हो जाना ठीक है या नहीं ? इसके उत्तर में यही कहना पड़ेगा कि छिपे हुए रोग को जान लेने से व्यक्ति की प्रसन्नता में बाधा भले ही उत्पन्न हो, पर जान लेना ही ठीक है, क्योंकि व्यक्ति अगर छिपे हुए रोग को जान ले, तो वह पथ्य और चिकित्सा के द्वारा उसे नियंत्रित कर सकता है, स्वस्थ हो सकता है, किन्तु रोग को न जानने के कारण व्यक्ति भले ही प्रसन्न रहे कि मुझे कोई रोग नहीं है, पर रोग तो भीतर ही भीतर पनपता रहता है और बाहर से वह मृत्यु की ओर बढ़ता रहता है । यह जैसे शरीर के संदर्भ में वैसे ही मन के संदर्भ में भी सत्य है । मन के रोगों को भी जो लोग रोग के रूप में नहीं जानते, वे बड़े प्रसन्न रहते हैं । इसलिए भागवत में कहा गया है - भाई ! संसार में दो ही प्रकार के लोग सुखी दिखाई देते हैं । "यश्च मूढतमो लोके"- एक तो वे जो बहुत ही मूढ़ हैं और इसका अभिप्राय यह है कि व्यक्ति तभी तक प्रसन्न है जब तक उसे छिपे हुए रोग का भान या ज्ञान नहीं है । इसलिए वह निश्चिंत होकर मनमाने आचरण करते हुए प्रसन्न रहता है । दूसरे प्रकार के सुखी वे लोग हैं - "यश्च बुद्धे: परं गतः" - जो पूरी तरह से रोगमुक्त हो चुके हैं, जिनमें समग्र स्वस्थता आ चुकी है । केवल बीच वाला व्यक्ति हर प्रकार से दुःखी हैंं । यह दुख ही मनुष्य के जीवन में साधना का द्वार खोलता है उसका मार्ग प्रशस्त करता है ।

Saturday, 13 February 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ............

विनयपत्रिका में गोस्वामीजी जब भगवान से कहते है कि मुझ पर कृपा कीजिए ! तो भगवान पूछते हैं कि किस विशेषता के कारण कृपा करें ? इस पर गोस्वामीजी एक बड़ी अनोखी बात कहते हैं । उनकी यह अनोखी पद्धति विनयपत्रिका के कई प्रसंगों में दिखाई देती है । वे भगवान को अपने गुणों के स्थान पर दोष ही दोष बताने लगते हैं । भगवान पूछते हैं कि तुम्हारे इन दोषों को सुनकर मन में कृपा उत्पन्न होगी या घृणा ? गोस्वामीजी कहते हैं कि महाराज ! आप चाहें तो एक बात पर प्रसन्न हो सकते हैं । किस पर ? इस बात पर कि सब दोष होते हुए भी मैंने कुछ छिपाया नहीं, सब कुछ कह दिया - अच्छा ! अब क्या चाहते हो ? गोस्वामीजी ने कहा कि प्रभो ! मैं अपने दोषों से हार गया हूँ, अब आप ही इन्हें दूर कर सकते हैं, आप मुझे इन दोषों से मुक्त कीजिए ।

Friday, 12 February 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

व्यक्ति अगर रोगी है तो पुनः स्वस्थता प्राप्त करने के लिए उसमें सबसे अधिक महत्वपूर्ण गुण कौन-सा होना चाहिए ? रोग तो किसी न किसी भूल अथवा कुपथ्य का ही परिणाम होता है । इसलिए रोगी के लिए सबसे अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि वह वैद्य के समक्ष अत्यंत सरल और निष्कपट भाव से अपनी भूल बता दे । अभिप्राय यह है कि कुछ रोग ऐसे भी हैं जो बड़े घृणित होते हैं और उनके मूल कारण भी बड़े जघन्य होते हैं । ऐसे रोगों का वर्णन करने में रोगी को संकोच होता है और वह उसे छिपाने का प्रयत्न करता है । ऐसी परिस्थिति में परिणाम क्या होता है ? जिस रोगी में छिपाने की वृत्ति होती है, उसका रोग असाध्य हो जाता है । इसलिए रोगी का सर्वोत्कृष्ट गुण यही है कि वह वैद्य के सामने अपने आपको पूरी तरह से खोलकर रख दे । जिस भूल या गलती के कारण उसे रोग हुआ है, उसे सरलतापूर्वक स्वीकार करके निष्कपट भाव से वैद्य को बता दे । यही रोगी के स्वस्थ होने का सर्वोत्कृष्ट उपाय है । भगवान राम को लगा कि सुग्रीव के चरित्र का सर्वोत्तम लक्षण यही है कि इनके चरित्र में रंचमात्र भी दुराव-छिपाव की वृत्ति नहीं है और वे निरंतर संत का आश्रय लिए हुए हैं । उन्होंने पूरी निश्छलता से साथ अपने अन्तःकरण की दुर्बलताओं को खोलकर रख दिया है; ऐसी स्थिति में इसकी स्वस्थता का सारा भार अब मेरे ऊपर है । रोगी जब वैद्य के सामने अपने दोषों को पूरी तरह से खोलकर रख देता है तब उसकी चिकित्सा करके उसे स्वस्थ्य बनाने का सारा भार वैद्य पर आ जाता है । सचमुच इन्हीं दो गुणों के कारण प्रभु सुग्रीव पर रीझ गये ।

Thursday, 11 February 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ...........

लक्ष्मणजी ने प्रभु से पूछा कि सुग्रीव की आत्मकथा सुनकर आपको कैसा लगा ? तो उन्होंने कहा कि लक्ष्मण ! सुग्रीव में तो नवधाभक्ति का नवाँ लक्षण पूरी तरह से विद्यमान है । नवाँ लक्षण क्या है ?- "नवम सरल सब सन छलहीना"- नवीं भक्ति है सरलता । प्रभु ने कहा कि लक्ष्मण ! क्या तुमने इस बात पर गौर किया कि सारी कथा सुग्रीव ने स्वयं सुनायी है । सुग्रीव के संबंध में ये बातें अगर कोई दूसरा सुनाता, तो सुनकर आश्चर्य नहीं होता, परन्तु स्वयं सुनाते समय सुग्रीव यदि चाहते तो अपने चरित्र को इस पद्धति से भी रख सकते थे कि जिससे उनकी अपनी दुर्बलताएॅ प्रकट न हो पातीं, लेकिन बड़ी सरलता से उन्होंने अपनी दुर्बलताओं को स्वीकार किया । यह बड़ी महत्वपूर्ण बात है । भक्तिशास्त्र में इसे अत्यधिक महत्व दिया गया है ।

Wednesday, 10 February 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........

सामान्यतः सुग्रीव के चरित्र में अनेक दुर्बलताएॅ दिखायी देती हैं, किन्तु उसके बावजूद वे यदि भगवान श्रीराम के पास आ सके और उनके जीवन का क्रमशः विकास होता गया, इसका कारण यही है कि दुर्बलताओं के होते हुए भी उनमें दो गुण बड़े महत्वपूर्ण थे । कौन से ? नवधाभक्ति के लक्षणों को अगर देखें तो उसमें भक्ति के दो ऐसे सूत्र हैं, जो सुग्रीव के जीवन में विद्यमान हैं । पहला है - भगवान शबरी से कहते हैं कि संत का संग मेरी पहली भक्ति है । सुग्रीव के जीवन में यह सूत्र विद्यमान है । वे भले ही दुर्बल चरित्र के हों, पर उन्हें हनुमानजी जैसे महान संत का संग प्राप्त है । दूसरा लक्षण जिससे भगवान अत्यंत प्रभावित हुए, वह है सुग्रीव की सरलता । उन्होंने भगवान को अपनी जो आत्मकथा सुनाई, उसे अगर कोई दूसरा सुने तो यही सोचेगा कि यह तो अत्यंत कायर और चुनौतियों से सदा पलायन करने वाला व्यक्ति है । लक्ष्मणजी पर तो यही प्रभाव पड़ा, क्योंकि सुग्रीव ने अपनी आत्मकथा में बार-बार भागने की ही बात कही थी । लेकिन भगवान तो सुग्रीव की आत्मकथा सुनकर गदगद हो गये । भगवान राम की दृष्टि क्या है ?

Tuesday, 9 February 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ...........

कैकेयी ने कहा कि राम ! तुम्हें यह तो नहीं लग रहा है कि भरत को राज्य और तुम्हें वनवास मिलने से इस बंटवारे में तुम्हें घाटा हुआ है ? भगवान राम ने कहा कि घाटा कैसा ? वे तो कहते हैं कि आज ब्रह्मा कितने अनुकूल हो गये हैं । जो मुझे इतना बड़ा लाभ हुआ । इतना सुख मिल रहा है । इसका अभिप्राय क्या है ? एक ओर काल, कर्म, स्वभाव एवं गुण ने प्रतिकूलता की सृष्टि की । एक व्यक्ति के स्वभाव ने मलिनता की सृष्टि की, वहीं दूसरी ओर भगवान राम का स्वभाव उस प्रतिकूलता में भी आनन्द की सृष्टि कर रहा है । वे अपने चरित्र के माध्यम से यह बताना चाहते हैं कि स्वभाव को बदल सकने पर दुख में भी आनन्द की वृत्ति ढ़ूॅढ़ी जा सकती है । इस प्रकार से मानस में गोस्वामीजी ने इसके स्वभावजन्य दुख के स्वरूप को, जिससे व्यक्ति निरर्थक ही दुखी होता है, समस्या के रूप में मंथरा से और इसका समाधान भगवान राम के चरित्र के माध्यम से प्रस्तुत किया है । एक ओर स्व का संकुचन और क्षुद्रता है, तो दूसरी ओर स्व का विस्तार और व्यापकता है । यह स्व की संकीर्णता ही हमारे जीवन में रामराज्य की स्थापना नहीं होने देती । भगवान राम का जो सर्वव्यापी स्वरूप है, वही मानो रामराज्य है और वही हमारे इस स्वभावजन्य दुख का समाधान है ।

Monday, 8 February 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ...........

मंथरा के ईर्ष्यालु और कुटिल स्वभाव ने रामराज्य नहीं बनने दिया । मार्ग में बाधा उत्पन्न कर दी । पर दूसरी ओर इस संकट में भी जो मुस्कुराते रहे, जिनका राज्य छीन लिया गया, जिन्हें राज्य से निकाल दिया गया, वे श्रीराम मुस्करा रहे हैं । बस ! यह दो स्वभावों की टकराहट है । एक ओर मंथरा का स्वभाव और दूसरी ओर श्रीराम का स्वभाव । जब कैकेयी ने बुलाकर श्रीराम से कहा कि मैनें महाराज दशरथ से दो वरदान मांगे हैं - एक तो भरत के लिए राज्य और दूसरा तुम्हारे लिए वन तो भगवान राम सुनकर प्रसन्न हो गए । कैकेयी उन्हे दुख देना चाहती है, मंथरा दुख देना चाहती है । श्रीराम कहते हैं - भरत तो मेरा प्राण हैंं । इसका अभिप्राय है कि भरत कोई दूसरे थोड़े ही है । जैसे व्यक्ति का प्राण अभिन्न होता है, वैसे ही भरत तो मुझसे अभिन्न है और यह दर्शन भगवान राम ने अपने बचपन में ही खेल के माध्यम से दिखा दिया था । खेल में जीत होने पर प्रसन्न होने की वृत्ति तो सबमें होती है, पर भगवान राम स्वयं हारकर, भरत को विजयी देखकर प्रसन्न होते हैं । भगवान तो अपने स्व को इतना फैलाये हुए हैं कि सब उनके भीतर हैं, उनमें ही सब समाये हुए हैं, मानो मनुष्य के भीतर उनका प्राण समाया हुआ है ।

Sunday, 7 February 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........

महाराज दशरथ के जीवन में जो समर्पण की वृत्ति थी, उसमें दातापन की सात्विक वृत्ति थी, राज्याभिषेक में अवरोध उत्पन्न होने पर अब वह भी मिट गयी । उन्होंने देख लिया कि वे चाहकर भी नहीं दे पाये । उनकी राह में यह अवरोध क्यों उत्पन्न हुआ ? केवल एक व्यक्ति - पढ़कर बड़ा आश्चर्य होता है । केवल एक मंथरा के कारण रामराज्य नहीं बन पाया और जहाँ पर मंथरा ही मंथरा हो, यहाँ हममें से प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में जितनी बड़ी संख्या में मंथराएॅ हैं, वहाँ हम कल्पना करें कि रामराज्य बन जायेगा, तो यह कितनी हास्यास्पद बात है ? यह मंथरा कौन है ? गोस्वामीजी ने एक ही वाक्य में कहा कि यह भेदबुद्धि ही मंथरा है । नगर सजाया जा रहा है, बाजे बज रहे हैं । मंथरा ने लोगों से पूछा कि यह सब क्या हो रहा है ? लोगों ने कहा कि कल श्रीराम सिंहासन पर बैठेंगे । बस ! इतना सुनते ही उसका ह्रदय जलने लगा । क्यों जलने लगा ? उसके अन्तःकरण में यह जो भेदबुद्धि है कि यह तिलक राम का हो रहा है, भरत का क्यों नहीं ? श्रीराम भी दशरथ के पुत्र हैं और श्रीभरत भी । प्रसन्न हो जाती कि राम को राज्य मिल रहा है । लेकिन उसके मन में इतनी तीव्र भेदबुद्धि है कि यह राज्य भले ही दशरथ के पुत्र को मिल रहा है, पर उस पुत्र को मिल रहा है जो कौशल्या का पुत्र है । कैकेयी के पुत्र को नहीं मिल रहा है । यह बड़ा अनर्थ हो रहा है । मैं तो इसे रोकने की चेष्टा करूँगी । एक व्यक्ति के इस ईर्ष्यालु और कुटिल स्वभाव ने रामराज्य नहीं बनने दिया ।

Saturday, 6 February 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ............

महाराज दशरथ परम प्रसन्न हैं । दरबार से समर्थन मिला और गुरु से भी समर्थन मिला । महाराज दशरथ ने आदेश दिया कि गुरु वशिष्ठ के आदेश से राज्याभिषेक की तैयारी की जाय - सब तीर्थों से जल ले आओ ! राज्याभिषेक की सामग्री एकत्र करो । रामराज्य की तैयारी होने लगी, लेकिन यह कितनी विचित्र बात है कि इतनी ऊंचाई पर पहुँचने के बाद, साधना के चरम उपलब्धि के क्षणों में भी अविद्या साधक को विचलित करने की चेष्टा करती है । विषयी तो वह है जो साधना की दिशा में बढ़ा ही नहीं और साधक वह है जो साधना की दिशा में बढ़ रहा है, पर एक साधक वह है जो साधना की चरम उपलब्धि के क्षणों में पहुंच चुका है, पर वहाँ से भी योगभ्रष्ट हो जाने की संभावना बनी रहती है । साधक अगर अंतिम क्षण में भी विचलित हो गया, तो दीपक बुझ जायेगा और वह अपने चरम लक्ष्य को पाने में सफल नहीं होगा और यही यहाँ पर भी हुआ । रामराज्य नहीं बन पाया । समर्पण का संकल्प पूरा नहीं हो पाया, लेकिन दशरथ का विकास एक दूसरे रूप में हुआ । समर्पण का संकल्प पूरा नहीं हुआ, रामराज्य नहीं बन पाया, पर इससे उनके अन्तःकरण में जिस वृत्ति का उदय हुआ, वह था - "येन त्यजसि तत्त्यज " । त्याग करो और जिस वृत्ति से त्याग किया जाता है, उस वृत्ति का भी त्याग करो । यही सर्वोत्कृष्ट त्याग है ।

Friday, 5 February 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ...........

दशरथजी के जीवन में अनुकूलता है । उनके समर्पण के संकल्प को समाज का समर्थन मिल गया । तब वे गुरु वशिष्ठ के पास गये । गुरु वशिष्ठ उनके कुल के आचार्य हैं । दशरथजी ने अपना संकल्प उनके चरणों में निवेदित किया और आशीर्वाद माँगा । अन्त में समर्पण का कार्य भी तो गुरु के द्वारा संपन्न होता है । इसलिए उन्होंने एकान्त में जाकर गुरुदेव के सामने अपनी भावना व्यक्त की । महाराज! मैंने अपने जीवन में जो भी चाहा, सब आपकी कृपा से पूरा हुआ । अब मेरे मन में एक ही आकांक्षा शेष है । शरीर नाशवान है, मृत्यु अवश्यंभावी है, मैं चाहता हूँ कि मेरे जीवन काल में ही श्रीराम सिंहासन पर बैठ जायॅ, मैं उन्हें अयोध्या का राज्य अर्पित कर दूँ । मेरा यह संकल्प क्या उचित है ? गुरु वशिष्ठ सच्चे अर्थों में गुरु थे । गुरू वशिष्ठ कहते हैं - देर बिल्कुल मत करो ! जल्दी करो! क्योंकि रामराज्य के लिए शुभ मुहूर्त की नहीं, शुभ मुहूर्त के लिए रामराज्य की आवश्यकता है ।

Thursday, 4 February 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

महाराज श्रीदशरथ के अन्तःकरण में जब समर्पण की वृत्ति का उदय हुआ तब उन्होंने क्या किया ? सभा में प्रश्न किया कि आप लोगों की क्या सम्मति है ? सभा में उपस्थित लोग भी वैसे ही अच्छे निकले । अगर चापलूस अथवा झूठे प्रशंसक होते तो कह देते कि सिंहासन पर आप ही बैठे रहिए । यदि कह देते कि आप तुरन्त सिंहासन छोड़ दीजिए! तब तो यही लगता कि ये सब महाराज के राज्य से ऊब चुके हैं, चाहते हैं कि ये जल्दी से जल्दी सत्ता से हटें और यदि ऐसा नहीं कहते तो ये राम के प्रति समर्पण के विरोधी सिद्ध होते । इसलिए बड़ी संतुलित भाषा में उन्होंने पहला वाक्य तो यह कहा कि महाराज!  हम तो चाहते हैं कि आप करोड़ों वर्ष तक जीवित रहें और श्रीराम को प्रेरणा देते रहें, उनका मार्गदर्शन करते रहें । आपके मन में जब संकल्प का उदय हुआ है तो अवश्य ही यह भार अब श्रीराम के ऊपर सौंप दें और श्रीराम को ऐसी प्रेरणा दें कि जिसके द्वारा सुन्दर पद्धति से राज्य का संचालन हो । महाराज श्री दशरथ के आसपास जो लोग हैं, वे उत्तम कोटि के हैं । यह भी महत्वपूर्ण प्रश्न है कि हमारे आसपास के लोग कैसे हैं ? वे हमारे जीवन में त्याग की प्रेरणा देते हैं, या भोग और संग्रह की ?

Wednesday, 3 February 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ..........

ईश्वर के प्रति समर्पण की वृत्ति का उदय होना ही दर्पण देखने का फल है और इसलिए गोस्वामीजी को दर्पण से इतना लगाव हो गया कि अयोध्याकाण्ड शुरू करते ही उन्होंने गुरुजी से पहली बात यही कही कि बालकाण्ड में तो आपने दृष्टि दे दी थी, लेकिन अब भी मुझे एक वस्तु की कमी का अनुभव हो रहा है । किस वस्तु की ? बोले - श्रीगुरु चरन सरोज रज । किसलिए ? - निज मनु मुकुर सुधारि । जैसे महाराज दशरथ ने दर्पण में देखा तो उनमें समत्व का उदय हुआ । आत्मनिरीक्षण करने पर उन्हें अपना दोष दिखायी पड़ा और अन्त में समर्पण की प्रेरणा उत्पन्न हुई । इसलिए हमारे जीवन का दर्पण भी इतना स्वच्छ हो जाय कि उसमें हम अपने आपको स्पष्ट रूप से देख सकें, दोषों को देखकर उन्हें दूर करने की चेष्टा करें और हमारे अन्तःकरण में समर्पण की वृत्ति का उदय हो । तभी हम समझेंगे कि रामकथा को हमने सही अर्थो में पढ़ा, सुना और समझा है । यह एक साधक का आत्मनिरीक्षण है, जिसे गोस्वामीजी ने महाराज दशरथ के दर्पण - दर्शन के माध्यम से प्रस्तुत किया है ।

Tuesday, 2 February 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........

दशरथजी के जीवन में पहली प्रेरणा प्राप्त हुई - उन्होंने तुरंत अपना मुकुट सीधा किया, पर उनकी दृष्टि और भी पैनी है । ज्योंही मुकुट सीधा हुआ तो अचानक सफेद बाल जो मुकुट से ढंके हुए थे, उन पर उनकी दृष्टि पड़ी । तब उन्होंने सोचा कि अरे ! सोने के मुकुट की आड़ में सफेदी छिपी हुई है । सोना रजोगुण का प्रतीक है, सत्ता का प्रतीक है और श्वेत रंग सतोगुण का प्रतीक है । उन्होंने सोचा कि सत्ता ने मेरे सत्त्व को ढॅक लिया था और यह सत्त्व मानो मेरे कान में संदेश दे रहा है, पर यह स्वर्ण मुकुट हमें सुनने नहीं दे रहा है । चलो, मुकुट जरा सीधा हुआ तो हमें प्रेरणा प्राप्त हुई । और वह सत्त्व का संदेश क्या था ? एक सफेद बाल कह रहा था कि महाराज! कब तक मुकुट सीधा करते रहेंगे ! अब इसे उतारिए! इसका अभिप्राय है कि पहली प्रेरणा दोषदर्शन, दूसरी है समत्व और तीसरी प्रेरणा हुई त्याग और समर्पण की और यही साधक के जीवन की सर्वोत्कृष्ट प्रेरणा है ।

Monday, 1 February 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

गोस्वामीजी ने एक सूत्र दिया कि दर्पण का लाभ क्या है ? दशरथजी के जीवन में इससे तीन बातें आयीं और वे बड़े महत्व की हैं । कौन सी ? दर्पण देखने पर कभी-कभी अभिमान भी होता हैं । कोई व्यक्ति अगर खड़ा होकर बार-बार अपने को शीशे में देखे और मन ही मन खुश हो कि वाह, मैं कितना सुंदर हूँ । तो दर्पण ने तो उसके अभिमान को और भी बढ़ा दिया । दर्पण अभिमान घटाने के लिए होना चाहिए बढ़ाने के लिए नहीं । अभिप्राय यह है कि आत्मनिरीक्षण का हम सदुपयोग कर रहे हैं या दुरूपयोग । यह इसी बात पर निर्भर करता है कि आत्मनिरीक्षण से हमारा अभिमान बढ़ रहा है या घट रहा है । यदि हम आत्मनिरीक्षण करके इसी निष्कर्ष पर पहुंचे कि हम तो बहुत अच्छे हैं, हममें सारी विशेषताएँ हैं, तो हमने सही अर्थो में आत्मनिरीक्षण नहीं किया, बल्कि अपने अन्तःकरण में आत्मप्रशंसा की एक वृत्ति पाल ली, लेकिन दशरथजी की दृष्टि कहां थी ? जब उन्होंने सुना कि दशरथ के समान कोई नहीं है, तो उन्होंने दर्पण उठा लिया और अपने आपको देखा । लोग कह रहे हैं कि दशरथ में सारे गुण हैं, पर दशरथजी ने दर्पण में देखा कि मुकुट टेढ़ा है और यह दोष है । लोगों की दृष्टि भले ही न गयी हो, पर दशरथजी की दृष्टि अपने दोष पर गयी । मैं सभा में बैठा हूँ, राजसिंहासन पर बैठा हूँ और मेरा मुकुट एक ओर झुक गया है, असंतुलित हो गया है । राजा को समत्व में स्थिर रहना चाहिए । मुकुट राजसत्ता का चिह्न है । इसलिए उनके मन में पहली प्रेरणा उत्पन्न हुई कि वे अपने मुकुट को सीधा करें । साधक वह है जो आत्मनिरीक्षण करके अपने मन के असंतुलन को देख सके और उसे समत्व की प्रेरणा प्राप्त हो । दशरथजी के जीवन में पहली प्रेरणा प्राप्त हुई - उन्होंने तुरंत अपना मुकुट सीधा किया ।
 रायॅ सुभायॅ मुकुट कर लीन्हा।
 बदनु बिलोकि मुकुटु सम कीन्हा।।