व्यक्ति अगर रोगी है तो पुनः स्वस्थता प्राप्त करने के लिए उसमें सबसे अधिक महत्वपूर्ण गुण कौन-सा होना चाहिए ? रोग तो किसी न किसी भूल अथवा कुपथ्य का ही परिणाम होता है । इसलिए रोगी के लिए सबसे अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि वह वैद्य के समक्ष अत्यंत सरल और निष्कपट भाव से अपनी भूल बता दे । अभिप्राय यह है कि कुछ रोग ऐसे भी हैं जो बड़े घृणित होते हैं और उनके मूल कारण भी बड़े जघन्य होते हैं । ऐसे रोगों का वर्णन करने में रोगी को संकोच होता है और वह उसे छिपाने का प्रयत्न करता है । ऐसी परिस्थिति में परिणाम क्या होता है ? जिस रोगी में छिपाने की वृत्ति होती है, उसका रोग असाध्य हो जाता है । इसलिए रोगी का सर्वोत्कृष्ट गुण यही है कि वह वैद्य के सामने अपने आपको पूरी तरह से खोलकर रख दे । जिस भूल या गलती के कारण उसे रोग हुआ है, उसे सरलतापूर्वक स्वीकार करके निष्कपट भाव से वैद्य को बता दे । यही रोगी के स्वस्थ होने का सर्वोत्कृष्ट उपाय है । भगवान राम को लगा कि सुग्रीव के चरित्र का सर्वोत्तम लक्षण यही है कि इनके चरित्र में रंचमात्र भी दुराव-छिपाव की वृत्ति नहीं है और वे निरंतर संत का आश्रय लिए हुए हैं । उन्होंने पूरी निश्छलता से साथ अपने अन्तःकरण की दुर्बलताओं को खोलकर रख दिया है; ऐसी स्थिति में इसकी स्वस्थता का सारा भार अब मेरे ऊपर है । रोगी जब वैद्य के सामने अपने दोषों को पूरी तरह से खोलकर रख देता है तब उसकी चिकित्सा करके उसे स्वस्थ्य बनाने का सारा भार वैद्य पर आ जाता है । सचमुच इन्हीं दो गुणों के कारण प्रभु सुग्रीव पर रीझ गये ।
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