सामान्यतः सुग्रीव के चरित्र में अनेक दुर्बलताएॅ दिखायी देती हैं, किन्तु उसके बावजूद वे यदि भगवान श्रीराम के पास आ सके और उनके जीवन का क्रमशः विकास होता गया, इसका कारण यही है कि दुर्बलताओं के होते हुए भी उनमें दो गुण बड़े महत्वपूर्ण थे । कौन से ? नवधाभक्ति के लक्षणों को अगर देखें तो उसमें भक्ति के दो ऐसे सूत्र हैं, जो सुग्रीव के जीवन में विद्यमान हैं । पहला है - भगवान शबरी से कहते हैं कि संत का संग मेरी पहली भक्ति है । सुग्रीव के जीवन में यह सूत्र विद्यमान है । वे भले ही दुर्बल चरित्र के हों, पर उन्हें हनुमानजी जैसे महान संत का संग प्राप्त है । दूसरा लक्षण जिससे भगवान अत्यंत प्रभावित हुए, वह है सुग्रीव की सरलता । उन्होंने भगवान को अपनी जो आत्मकथा सुनाई, उसे अगर कोई दूसरा सुने तो यही सोचेगा कि यह तो अत्यंत कायर और चुनौतियों से सदा पलायन करने वाला व्यक्ति है । लक्ष्मणजी पर तो यही प्रभाव पड़ा, क्योंकि सुग्रीव ने अपनी आत्मकथा में बार-बार भागने की ही बात कही थी । लेकिन भगवान तो सुग्रीव की आत्मकथा सुनकर गदगद हो गये । भगवान राम की दृष्टि क्या है ?
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