महाराज दशरथ परम प्रसन्न हैं । दरबार से समर्थन मिला और गुरु से भी समर्थन मिला । महाराज दशरथ ने आदेश दिया कि गुरु वशिष्ठ के आदेश से राज्याभिषेक की तैयारी की जाय - सब तीर्थों से जल ले आओ ! राज्याभिषेक की सामग्री एकत्र करो । रामराज्य की तैयारी होने लगी, लेकिन यह कितनी विचित्र बात है कि इतनी ऊंचाई पर पहुँचने के बाद, साधना के चरम उपलब्धि के क्षणों में भी अविद्या साधक को विचलित करने की चेष्टा करती है । विषयी तो वह है जो साधना की दिशा में बढ़ा ही नहीं और साधक वह है जो साधना की दिशा में बढ़ रहा है, पर एक साधक वह है जो साधना की चरम उपलब्धि के क्षणों में पहुंच चुका है, पर वहाँ से भी योगभ्रष्ट हो जाने की संभावना बनी रहती है । साधक अगर अंतिम क्षण में भी विचलित हो गया, तो दीपक बुझ जायेगा और वह अपने चरम लक्ष्य को पाने में सफल नहीं होगा और यही यहाँ पर भी हुआ । रामराज्य नहीं बन पाया । समर्पण का संकल्प पूरा नहीं हो पाया, लेकिन दशरथ का विकास एक दूसरे रूप में हुआ । समर्पण का संकल्प पूरा नहीं हुआ, रामराज्य नहीं बन पाया, पर इससे उनके अन्तःकरण में जिस वृत्ति का उदय हुआ, वह था - "येन त्यजसि तत्त्यज " । त्याग करो और जिस वृत्ति से त्याग किया जाता है, उस वृत्ति का भी त्याग करो । यही सर्वोत्कृष्ट त्याग है ।
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