Friday, 19 February 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच............

सुरदासजी का एक प्रसिद्ध आख्यान है । सुरदासजी में दैन्य की पराकाष्ठा थी । एक बार वल्लभाचार्यजी से उनकी भेंट हुई । वल्लभाचार्यजी ने उनसे कहा - कुछ सुनाइए । सुरदासजी ने बड़े दीनतापूर्ण शब्दों में सुनाया - 'मो सम कौन कुटिल खल कामी' । उस पद में उन्होंने अपने दोषों का बड़े विस्तार से वर्णन किया । तब आचार्यजी ने क्या किया ? उन्होंने अनुभव किया कि इनका दैन्य अब चरम सीमा तक पहुँच चुका है । अगर ये इस दैन्य में ही लगे रहेंगे, निरन्तर अपने दोषों का ही चिन्तन करते रहेंगे तो दोषों में डूब जायेंगे । इसलिए उन्होंने कहा - अरे ! कुछ भगवान के गुण सुनाओ ! अभिप्राय यह है कि स्वदोष चिन्तन तो रोग का ज्ञान है और भगवान के गुणों का चिन्तन उस रोग की दवा है । स्वदोष चिन्तन के साथ अगर भगवान के गुणों का चिन्तन है, तब तो वह कल्याणकारी है, किन्तु अगर केवल दोष का चिन्तन हो रहा हो और भगवान के गुणों की दवा साथ न हो तो नि:संदेह ऐसा रोगी रोग की असाध्य अवस्था में पहुँचकर आतंकित हो जायेगा ।

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