Sunday, 14 February 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ..........

अपने दोष या रोग का ज्ञान हो जाना ठीक है या नहीं ? इसके उत्तर में यही कहना पड़ेगा कि छिपे हुए रोग को जान लेने से व्यक्ति की प्रसन्नता में बाधा भले ही उत्पन्न हो, पर जान लेना ही ठीक है, क्योंकि व्यक्ति अगर छिपे हुए रोग को जान ले, तो वह पथ्य और चिकित्सा के द्वारा उसे नियंत्रित कर सकता है, स्वस्थ हो सकता है, किन्तु रोग को न जानने के कारण व्यक्ति भले ही प्रसन्न रहे कि मुझे कोई रोग नहीं है, पर रोग तो भीतर ही भीतर पनपता रहता है और बाहर से वह मृत्यु की ओर बढ़ता रहता है । यह जैसे शरीर के संदर्भ में वैसे ही मन के संदर्भ में भी सत्य है । मन के रोगों को भी जो लोग रोग के रूप में नहीं जानते, वे बड़े प्रसन्न रहते हैं । इसलिए भागवत में कहा गया है - भाई ! संसार में दो ही प्रकार के लोग सुखी दिखाई देते हैं । "यश्च मूढतमो लोके"- एक तो वे जो बहुत ही मूढ़ हैं और इसका अभिप्राय यह है कि व्यक्ति तभी तक प्रसन्न है जब तक उसे छिपे हुए रोग का भान या ज्ञान नहीं है । इसलिए वह निश्चिंत होकर मनमाने आचरण करते हुए प्रसन्न रहता है । दूसरे प्रकार के सुखी वे लोग हैं - "यश्च बुद्धे: परं गतः" - जो पूरी तरह से रोगमुक्त हो चुके हैं, जिनमें समग्र स्वस्थता आ चुकी है । केवल बीच वाला व्यक्ति हर प्रकार से दुःखी हैंं । यह दुख ही मनुष्य के जीवन में साधना का द्वार खोलता है उसका मार्ग प्रशस्त करता है ।

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