रामचरितमानस में जीवों का जो विभाजन किया गया है - विषई साधक सिद्ध सयाने । - विषयी होना जीव की पहली श्रेणी है । विषयी वह है जो विषय में सुख अनुभव कर रहा है । साधक दूसरी श्रेणी का जीव है । साधक वह है जिसे विषय प्राप्त होने पर भी उसमें सुख के स्थान पर दुख की ही अनुभूति होती है । यही साधक का लक्षण है और यहीं से साधना प्रारंभ होती है । इस दुखानुभूति के बिना साधना प्रारंभ ही नहीं हो सकती । अभिप्राय यह है कि व्यक्ति के जीवन में साधना का श्रीगणेश तभी होगा, जब उसे अपनी त्रुटियों, दोषों और रोगों का ज्ञान होगा । तब स्वाभाविक रूप से उसके अन्तःकरण में दुख की अनुभूति होगी, विषयों के कड़वेपन की अनुभूति होगी । बिना इस अनुभूति के कोई व्यक्ति साधक नहीं हो सकता ।
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