गोस्वामीजी विनयपत्रिका में जब अपने दोषों का विश्लेषण करते हैं, तब उसके साथ-साथ भगवान के गुणों का भी वर्णन करते हैं । उससे अन्तर्मन में रस की अनुभूति होती है । जैसे आयुर्वेद में असाध्य रोगों में रस का प्रयोग किया जाता है, उसी तरह मन के रोगों के लिए भगवान की भक्ति तथा उनका गुणगान ही भक्तिरस है । इस भक्ति के रस की विशेषता यह है कि इससे निराशा के स्थान पर आशा तथा दैन्य के स्थान पर प्रभु के गुणों का संचार होता है । इससे दोष दूर होते हैं, रोग छूट जाता है । नैराश्य और दैन्य दूर होकर ह्रदय भक्तिरस से भर जाता है । विनयपत्रिका की सबसे बड़ी विशेषता यही है ।
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