Tuesday, 9 February 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ...........

कैकेयी ने कहा कि राम ! तुम्हें यह तो नहीं लग रहा है कि भरत को राज्य और तुम्हें वनवास मिलने से इस बंटवारे में तुम्हें घाटा हुआ है ? भगवान राम ने कहा कि घाटा कैसा ? वे तो कहते हैं कि आज ब्रह्मा कितने अनुकूल हो गये हैं । जो मुझे इतना बड़ा लाभ हुआ । इतना सुख मिल रहा है । इसका अभिप्राय क्या है ? एक ओर काल, कर्म, स्वभाव एवं गुण ने प्रतिकूलता की सृष्टि की । एक व्यक्ति के स्वभाव ने मलिनता की सृष्टि की, वहीं दूसरी ओर भगवान राम का स्वभाव उस प्रतिकूलता में भी आनन्द की सृष्टि कर रहा है । वे अपने चरित्र के माध्यम से यह बताना चाहते हैं कि स्वभाव को बदल सकने पर दुख में भी आनन्द की वृत्ति ढ़ूॅढ़ी जा सकती है । इस प्रकार से मानस में गोस्वामीजी ने इसके स्वभावजन्य दुख के स्वरूप को, जिससे व्यक्ति निरर्थक ही दुखी होता है, समस्या के रूप में मंथरा से और इसका समाधान भगवान राम के चरित्र के माध्यम से प्रस्तुत किया है । एक ओर स्व का संकुचन और क्षुद्रता है, तो दूसरी ओर स्व का विस्तार और व्यापकता है । यह स्व की संकीर्णता ही हमारे जीवन में रामराज्य की स्थापना नहीं होने देती । भगवान राम का जो सर्वव्यापी स्वरूप है, वही मानो रामराज्य है और वही हमारे इस स्वभावजन्य दुख का समाधान है ।

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