Monday, 22 February 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

गोस्वामीजी विनयपत्रिका के एक पद में भगवान से प्रार्थना करते हैं - "कीजै मोको जमजातनामई" । यह पहला वाक्य है, यहाँ से प्रारंभ करते हैं कि प्रभो ! मुझे यमयातना में डाल दीजिए । नरक में भी जो सबसे भीषण यातना होती है, उसे यमयातना कहते हैं । कई लोग तो डर के मारे नहीं पढ़ते होंगे । कहाँ तो हम भगवान से सुख, सम्पत्ति माँग रहे हैं, और कहाँ तुलसीदासजी कह रहे हैं कि हमें नरक में डाल दीजिए । भगवान से प्रार्थना नरक से छुड़ाने के लिए की जाती है कि नरक में डालने के लिए ? लेकिन इस पद की विशेषता क्या है ? जिस समय वे कहते हैं कि मुझे नरक में डाल दीजिए, उस समय उनकी वृत्ति क्या है ?  वे अपने रोगों के एक-एक लक्षण बड़ी बारीकी से देख रहे हैं । शरीर के संदर्भ में जैसे अणुवीक्षण यंत्र के द्वारा रोगाणुओं को हजारों गुना बढ़ाकर उसे बड़ी सूक्ष्मता से निरीक्षण किया जाता है, उसी तरह मन के रोगों में भी गोस्वामीजी की दृष्टि की विशेषता यही है कि वे अपने दोषों को इतना बड़ा बनाकर देखते हैं कि ताकि उन्हें पूरी तरह समझ लेने में कोई कमी न रह जाए ।
        ......आगे कल ......

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