Friday, 5 February 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ...........

दशरथजी के जीवन में अनुकूलता है । उनके समर्पण के संकल्प को समाज का समर्थन मिल गया । तब वे गुरु वशिष्ठ के पास गये । गुरु वशिष्ठ उनके कुल के आचार्य हैं । दशरथजी ने अपना संकल्प उनके चरणों में निवेदित किया और आशीर्वाद माँगा । अन्त में समर्पण का कार्य भी तो गुरु के द्वारा संपन्न होता है । इसलिए उन्होंने एकान्त में जाकर गुरुदेव के सामने अपनी भावना व्यक्त की । महाराज! मैंने अपने जीवन में जो भी चाहा, सब आपकी कृपा से पूरा हुआ । अब मेरे मन में एक ही आकांक्षा शेष है । शरीर नाशवान है, मृत्यु अवश्यंभावी है, मैं चाहता हूँ कि मेरे जीवन काल में ही श्रीराम सिंहासन पर बैठ जायॅ, मैं उन्हें अयोध्या का राज्य अर्पित कर दूँ । मेरा यह संकल्प क्या उचित है ? गुरु वशिष्ठ सच्चे अर्थों में गुरु थे । गुरू वशिष्ठ कहते हैं - देर बिल्कुल मत करो ! जल्दी करो! क्योंकि रामराज्य के लिए शुभ मुहूर्त की नहीं, शुभ मुहूर्त के लिए रामराज्य की आवश्यकता है ।

No comments:

Post a Comment