साधक के जीवन में स्वदोष दर्शन से जो दीनता की वृत्ति आती है, वह साधक को विनत होकर सद्गुरु-वैद्य के पास जाने की, साधना अथवा चिकित्सा के लिए प्रस्तुत होने की प्रेरणा देने वाली हो, न कि आत्महत्या की । साधक के दैन्य का अभिप्राय है - अभिमान शून्यता, निष्कपटता । यह न होकर दीनता अगर साधक के जीवन में आत्मघाती प्रवृत्ति की सृष्टि करे, तब तो वह रोग से भी अधिक घातक है । यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण सूत्र है । इसे अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि कहीं हम उलटा पाठ न पढ़ लें । दोष को जान लेना और उसे दूर करने का प्रयत्न करना ही साधक वृत्ति है ।
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