शरीर के समान ही मन के संदर्भ में भी व्यक्ति को जब अपने रोगों का ज्ञान होता है, तब उसके अन्तःकरण में बड़ी व्याकुलता होती है, लेकिन यहाँ भी बड़ी सावधानी की आवश्यकता होती है और वह यह है कि रोग का ज्ञान हो जाने के बाद व्यक्ति अगर चौबीसों घण्टे रोग का ही चिन्तन करता रहे कि हाय मुझे यह कैसा रोग हो गया, साँप के काट लेने पर यदि कोई व्यक्ति इतना अधिक आतंकित हो जाय कि दवा करने के बजाय केवल यही कल्पना करता रहे कि अब तो मैं बचूँगा नहीं । तो उसका परिणाम क्या होगा ? यही कि वह विष से मरने के स्थान पर आंतक से पहले ही मर जायेगा । अभिप्राय यह है कि न जानना तो घातक है ही किन्तु जानने का अतिरेक भी उचित नहीं है । उचित तो यही है कि व्यक्ति अपने रोग को जाने और उस रोग निवारण का उपाय करे । जैसे हम रोग को जान लेने के बाद डॉक्टर या वैद्य का आश्रय लेते हैं और उसके बताये हुए पथ्य या दवा का सेवन करके प्रसन्न होते हैं कि अच्छा हुआ कि समय पर हमें रोग का ज्ञान हो गया, अब चिकित्सा और पथ्य के द्वारा मैं स्वस्थ हो जाऊँगा । इस तरह से रोग के साथ यदि रोगी के मन में स्वस्थता की वृत्ति का उदय हो तब तो वह रोग का ज्ञान कल्याणकारी है, किन्तु इसके विपरीत यदि वह केवल भय और आंतक की सृष्टि करे तो वह रोग का ज्ञान कल्याणकारी नहीं है ।
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