Tuesday, 2 February 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........

दशरथजी के जीवन में पहली प्रेरणा प्राप्त हुई - उन्होंने तुरंत अपना मुकुट सीधा किया, पर उनकी दृष्टि और भी पैनी है । ज्योंही मुकुट सीधा हुआ तो अचानक सफेद बाल जो मुकुट से ढंके हुए थे, उन पर उनकी दृष्टि पड़ी । तब उन्होंने सोचा कि अरे ! सोने के मुकुट की आड़ में सफेदी छिपी हुई है । सोना रजोगुण का प्रतीक है, सत्ता का प्रतीक है और श्वेत रंग सतोगुण का प्रतीक है । उन्होंने सोचा कि सत्ता ने मेरे सत्त्व को ढॅक लिया था और यह सत्त्व मानो मेरे कान में संदेश दे रहा है, पर यह स्वर्ण मुकुट हमें सुनने नहीं दे रहा है । चलो, मुकुट जरा सीधा हुआ तो हमें प्रेरणा प्राप्त हुई । और वह सत्त्व का संदेश क्या था ? एक सफेद बाल कह रहा था कि महाराज! कब तक मुकुट सीधा करते रहेंगे ! अब इसे उतारिए! इसका अभिप्राय है कि पहली प्रेरणा दोषदर्शन, दूसरी है समत्व और तीसरी प्रेरणा हुई त्याग और समर्पण की और यही साधक के जीवन की सर्वोत्कृष्ट प्रेरणा है ।

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