...कल से आगे .......
शरीर चिकित्सा विज्ञान में आजकल जैसे अणुवीक्षण यंत्र के द्वारा परीक्षा करने की यह शैली साधकों की परम्परा में प्राचीनकाल से चली आ रही है । उनके पास भी एक अणुवीक्षण यंत्र है । कौन-सा ? वह यंत्र है मन की अन्तर्मुखता और एकाग्रता । अन्तर्मुखी मन जब एकाग्र होकर अपने दोषों को देखता है तो उसे अपने राई के बराबर दोष भी पहाड़ सरीखे दिखने लगते हैं । वही यंत्र लेकर गोस्वामीजी अपने दोषों को देखते हैं । अपने अन्तःकरण - 'मन,बुद्धि, चित्त और अहंकार ' एक-एक को बड़ी बारीकी से देखते हैं, उन्हें कई गुना बढ़ाकर देखते हैं, जो दोष सामान्यतया पकड़ में नहीं आते, उन्हें पकड़ते हैं और भगवान से कहते हैं - प्रभो ! मुझमें इतने बड़े-बड़े दोष हैं, मैंने इतने अपराध किये हैं । इनका दण्ड तो मुझे मिलना ही चाहिए । कौन-सा अपराध ? वे प्रभु की कृपा याद करते हुए कहते हैं - माता-पिता के रूप में आपने मुझे जन्म दिया, लालन-पोषण किया और मैं कितना कृतघ्न हूँ कि आपकी इस कृपा को भूलकर संसार में डूब गया । जब मेरी दृष्टि इस ओर जाती है, तब मुझे लगता है कि इन अपराधों के कारण क्यों न मुझे यमयातना में डाल दिया जाय ? किन्तु अपनी इस प्रार्थना का समापन वे कहाँ करते हैं ? कहते हैं कि प्रभो ! मैं जानता हूँ कि आप मेरी इस प्रार्थना को स्वीकार नहीं कर सकेंगे । क्यों ? कहते हैं - प्रभो ! मैं समझ गया, भले ही मैं अपने दोष आपसे कहूँ ! किन्तु आपका स्वभाव ऐसा है कि इतने पर भी आप मेरा हित ही करने आये हैं, कर रहे हैं और आप अपने इस स्वभाव को छोड़ नहीं सकते, इसलिए आगे भी करते रहेंगे ।
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