Monday, 8 February 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ...........

मंथरा के ईर्ष्यालु और कुटिल स्वभाव ने रामराज्य नहीं बनने दिया । मार्ग में बाधा उत्पन्न कर दी । पर दूसरी ओर इस संकट में भी जो मुस्कुराते रहे, जिनका राज्य छीन लिया गया, जिन्हें राज्य से निकाल दिया गया, वे श्रीराम मुस्करा रहे हैं । बस ! यह दो स्वभावों की टकराहट है । एक ओर मंथरा का स्वभाव और दूसरी ओर श्रीराम का स्वभाव । जब कैकेयी ने बुलाकर श्रीराम से कहा कि मैनें महाराज दशरथ से दो वरदान मांगे हैं - एक तो भरत के लिए राज्य और दूसरा तुम्हारे लिए वन तो भगवान राम सुनकर प्रसन्न हो गए । कैकेयी उन्हे दुख देना चाहती है, मंथरा दुख देना चाहती है । श्रीराम कहते हैं - भरत तो मेरा प्राण हैंं । इसका अभिप्राय है कि भरत कोई दूसरे थोड़े ही है । जैसे व्यक्ति का प्राण अभिन्न होता है, वैसे ही भरत तो मुझसे अभिन्न है और यह दर्शन भगवान राम ने अपने बचपन में ही खेल के माध्यम से दिखा दिया था । खेल में जीत होने पर प्रसन्न होने की वृत्ति तो सबमें होती है, पर भगवान राम स्वयं हारकर, भरत को विजयी देखकर प्रसन्न होते हैं । भगवान तो अपने स्व को इतना फैलाये हुए हैं कि सब उनके भीतर हैं, उनमें ही सब समाये हुए हैं, मानो मनुष्य के भीतर उनका प्राण समाया हुआ है ।

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