महाराज श्रीदशरथ के अन्तःकरण में जब समर्पण की वृत्ति का उदय हुआ तब उन्होंने क्या किया ? सभा में प्रश्न किया कि आप लोगों की क्या सम्मति है ? सभा में उपस्थित लोग भी वैसे ही अच्छे निकले । अगर चापलूस अथवा झूठे प्रशंसक होते तो कह देते कि सिंहासन पर आप ही बैठे रहिए । यदि कह देते कि आप तुरन्त सिंहासन छोड़ दीजिए! तब तो यही लगता कि ये सब महाराज के राज्य से ऊब चुके हैं, चाहते हैं कि ये जल्दी से जल्दी सत्ता से हटें और यदि ऐसा नहीं कहते तो ये राम के प्रति समर्पण के विरोधी सिद्ध होते । इसलिए बड़ी संतुलित भाषा में उन्होंने पहला वाक्य तो यह कहा कि महाराज! हम तो चाहते हैं कि आप करोड़ों वर्ष तक जीवित रहें और श्रीराम को प्रेरणा देते रहें, उनका मार्गदर्शन करते रहें । आपके मन में जब संकल्प का उदय हुआ है तो अवश्य ही यह भार अब श्रीराम के ऊपर सौंप दें और श्रीराम को ऐसी प्रेरणा दें कि जिसके द्वारा सुन्दर पद्धति से राज्य का संचालन हो । महाराज श्री दशरथ के आसपास जो लोग हैं, वे उत्तम कोटि के हैं । यह भी महत्वपूर्ण प्रश्न है कि हमारे आसपास के लोग कैसे हैं ? वे हमारे जीवन में त्याग की प्रेरणा देते हैं, या भोग और संग्रह की ?
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