Saturday, 27 February 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........

शरीर के रोगों के संदर्भ में रोगी को जैसे वैद्य के द्वारा बताए गए औषध और पथ्य को स्वीकार करना पड़ता है, इसी प्रकार साधक को भी सद्गुण और सत्कर्म का औषध-पथ्य स्वीकार करना पड़ता है, परन्तु मन के रोगों के संदर्भ में गोस्वामीजी इतना और जोड़ देते हैं कि साधक के जीवन में साधना की स्वीकृति तो अवश्य है, किन्तु ये रोग साधना अथवा प्रयत्न से दूर नहीं हो सकते । कहीं वह यह समझने की भूल न कर बैठे कि मैं अपने प्रयत्न से इन रोगों को दूर कर लूँगा । वे साधक को सावधान कर देते हैं । 'ज्ञानदीपक' प्रसंग में ज्ञान का दीपक जलाना मुख्य रूप से पुरूषार्थ का कार्य है । व्यक्ति को ज्ञान पुरूषार्थ के द्वारा प्राप्त होता है, लेकिन गोस्वामीजी ने ज्ञान-दीपक प्रसंग का प्रारंभ भी कृपा से ही किया । ज्ञान की प्राप्ति कैसे होगी ? इसके उत्तर में वे कहते हैं कि जब ह्रदय में सात्त्विक श्रद्धा आ जाय । यह सात्त्विक श्रद्धा कैसे आयेगी ? गोस्वामीजी एक सूत्र देते हैं -
     सात्त्विक श्रद्धा धेनु सुहाई ।
     जौं हरि कृपाँ ह्रदयँ बस आई।।
अतः व्यक्ति चाहे जितना भी सत्कर्म क्यों न करे ? चाहे जितना विचार भी क्यों न करे। उसके मूल में भगवान की कृपा ही विद्यमान है । वे यही कहते हैं कि भगवान की कृपा से ही मन के रोग दूर होते हैं, लेकिन साथ ही साथ यह भी कह देते हैं कि 'जौं एहि भाँति बनै संजोगा'। और फिर वे क्रम बताते हैं -
      सद्गुर बैद बचन विश्वासा ।
      संजम यह न विषय के आसा ।।
      रघुपति भगति सजीवन मूरी ।
      अनूपान श्रद्धामति पूरी ।।
      एहि बिधि भलेंहि सो रोग नसाहीं ।
      नाहिं त जतन कोटि नहिं जाहिं ।।

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