विनयपत्रिका में गोस्वामीजी जब भगवान से कहते है कि मुझ पर कृपा कीजिए ! तो भगवान पूछते हैं कि किस विशेषता के कारण कृपा करें ? इस पर गोस्वामीजी एक बड़ी अनोखी बात कहते हैं । उनकी यह अनोखी पद्धति विनयपत्रिका के कई प्रसंगों में दिखाई देती है । वे भगवान को अपने गुणों के स्थान पर दोष ही दोष बताने लगते हैं । भगवान पूछते हैं कि तुम्हारे इन दोषों को सुनकर मन में कृपा उत्पन्न होगी या घृणा ? गोस्वामीजी कहते हैं कि महाराज ! आप चाहें तो एक बात पर प्रसन्न हो सकते हैं । किस पर ? इस बात पर कि सब दोष होते हुए भी मैंने कुछ छिपाया नहीं, सब कुछ कह दिया - अच्छा ! अब क्या चाहते हो ? गोस्वामीजी ने कहा कि प्रभो ! मैं अपने दोषों से हार गया हूँ, अब आप ही इन्हें दूर कर सकते हैं, आप मुझे इन दोषों से मुक्त कीजिए ।
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