Sunday, 7 February 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........

महाराज दशरथ के जीवन में जो समर्पण की वृत्ति थी, उसमें दातापन की सात्विक वृत्ति थी, राज्याभिषेक में अवरोध उत्पन्न होने पर अब वह भी मिट गयी । उन्होंने देख लिया कि वे चाहकर भी नहीं दे पाये । उनकी राह में यह अवरोध क्यों उत्पन्न हुआ ? केवल एक व्यक्ति - पढ़कर बड़ा आश्चर्य होता है । केवल एक मंथरा के कारण रामराज्य नहीं बन पाया और जहाँ पर मंथरा ही मंथरा हो, यहाँ हममें से प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में जितनी बड़ी संख्या में मंथराएॅ हैं, वहाँ हम कल्पना करें कि रामराज्य बन जायेगा, तो यह कितनी हास्यास्पद बात है ? यह मंथरा कौन है ? गोस्वामीजी ने एक ही वाक्य में कहा कि यह भेदबुद्धि ही मंथरा है । नगर सजाया जा रहा है, बाजे बज रहे हैं । मंथरा ने लोगों से पूछा कि यह सब क्या हो रहा है ? लोगों ने कहा कि कल श्रीराम सिंहासन पर बैठेंगे । बस ! इतना सुनते ही उसका ह्रदय जलने लगा । क्यों जलने लगा ? उसके अन्तःकरण में यह जो भेदबुद्धि है कि यह तिलक राम का हो रहा है, भरत का क्यों नहीं ? श्रीराम भी दशरथ के पुत्र हैं और श्रीभरत भी । प्रसन्न हो जाती कि राम को राज्य मिल रहा है । लेकिन उसके मन में इतनी तीव्र भेदबुद्धि है कि यह राज्य भले ही दशरथ के पुत्र को मिल रहा है, पर उस पुत्र को मिल रहा है जो कौशल्या का पुत्र है । कैकेयी के पुत्र को नहीं मिल रहा है । यह बड़ा अनर्थ हो रहा है । मैं तो इसे रोकने की चेष्टा करूँगी । एक व्यक्ति के इस ईर्ष्यालु और कुटिल स्वभाव ने रामराज्य नहीं बनने दिया ।

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