विनयपत्रिका में एक बड़ी मधुर बात कही गई है । कोई प्रश्न करता है कि अपने अनुभव को प्रमाण मानें या आपके शब्दों को ? उन्होंने पूछा - क्यों ? बोले - यदि कोई वस्तु मीठी लग रही हो और कहीं व्याख्यान से सुनने को मिले कि वह कड़वी है, तो प्रमाण हम अपने जीभ को मानेंगे या उस भाषण को ? गोस्वामीजी ने कहा कि व्यक्ति का अनुभव तो बड़ा महत्वपूर्ण होता है, लेकिन कभी-कभी तो ऐसा अनुभव होना सावधान करने के लिए होता है । उन्होंने इसका एक सुंदर दृष्टांत दिया कि जैसे अंधेरे में अगर कोई जन्तु काट ले और मन में संदेह हो कि कहीं साँप आदि किसी जहरीले जन्तु ने तो नहीं काट लिया ? तो उसकी परीक्षा करने के लिए एक पद्धति यह है कि जिस व्यक्ति को जन्तु ने काटा है उसका व्यक्ति को नीम की पत्तियाँ खिलायी जाती हैं । यदि नीम की पत्तियाँ उसे कड़वी लगे तो लोग प्रसन्न हो जाते हैंं कि उसे जहरीले साँप ने नहीं, बल्कि चूहे आदि ने काटा होगा, लेकिन वह व्यक्ति यदि कहने लगे कि नीम की पत्ती मीठी लग रही है, तो इस अनुभूति से न तो रोगी प्रसन्न होता है न ही परीक्षा करने वाले । क्योंकि मान्यता यह हैंं कि जब किसी व्यक्ति को साँप काट लेता है और उसका विष शरीर में फैल जाता है, तब उस व्यक्ति को नीम की पत्ती कड़वी नहीं, मीठी लगती है । अतः नीम की पत्ती कड़वी लगने के स्थान पर मीठी लगने से जैसे व्यक्ति स्वयं और अन्य लोग भी समझ लेते हैं कि इसे किसी विषैले सर्प ने काट लिया है, अब इसकी चिकित्सा होनी चाहिए । गोस्वामीजी कहते हैं कि इसी प्रकार इस संसार का विषय भी नीम के पत्ते के समान कड़वा है । अब यह कड़वा विषय अगर आपको मीठा लग रहा है तो सिर्फ मिठास की अनुभूति से आप प्रसन्न न हों, इसे आप सत्य प्रमाण नहीं मानें, बल्कि इससे आप निश्चित समझ लीजिए कि आपको काम-सर्प ने डस लिया है ।
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