ईश्वर के प्रति समर्पण की वृत्ति का उदय होना ही दर्पण देखने का फल है और इसलिए गोस्वामीजी को दर्पण से इतना लगाव हो गया कि अयोध्याकाण्ड शुरू करते ही उन्होंने गुरुजी से पहली बात यही कही कि बालकाण्ड में तो आपने दृष्टि दे दी थी, लेकिन अब भी मुझे एक वस्तु की कमी का अनुभव हो रहा है । किस वस्तु की ? बोले - श्रीगुरु चरन सरोज रज । किसलिए ? - निज मनु मुकुर सुधारि । जैसे महाराज दशरथ ने दर्पण में देखा तो उनमें समत्व का उदय हुआ । आत्मनिरीक्षण करने पर उन्हें अपना दोष दिखायी पड़ा और अन्त में समर्पण की प्रेरणा उत्पन्न हुई । इसलिए हमारे जीवन का दर्पण भी इतना स्वच्छ हो जाय कि उसमें हम अपने आपको स्पष्ट रूप से देख सकें, दोषों को देखकर उन्हें दूर करने की चेष्टा करें और हमारे अन्तःकरण में समर्पण की वृत्ति का उदय हो । तभी हम समझेंगे कि रामकथा को हमने सही अर्थो में पढ़ा, सुना और समझा है । यह एक साधक का आत्मनिरीक्षण है, जिसे गोस्वामीजी ने महाराज दशरथ के दर्पण - दर्शन के माध्यम से प्रस्तुत किया है ।
No comments:
Post a Comment