सुग्रीव के चरित्र में दुर्बलताएॅ अवश्य हैं, किन्तु उसके साथ ही उसमें एक विशेषता है । छल और कपट की वृत्ति उनमें बिल्कुल नहीं है । वे बड़े सरल हैं, भगवान के सामने अपनी सारी दुर्बलताओं को प्रकट करते हुए वे बड़े स्पष्ट शब्दों में कह देते हैं - महाराज ! इन बुराइयों का नाश व्यक्ति के पुरूषार्थ से नहीं होता है । यह आपकी कृपा से ही दूर होता है । रोगी ने तो अपना रोग बता दिया, अब इसके आगे वैद्य की भूमिका है । रोगी को स्वस्थ बनाना वैद्य का काम है । वैसे रोगी का भी यह कर्तव्य है कि वह वैद्य द्वारा दी गई दवा तथा पथ्य का सेवन करे । इतना सहयोग तो उसे करना होगा । अभिप्राय यह है कि जब हमें सद्गुण की औषध और सदाचार का पथ्य दिया जाय, तो हमें सच्चाई के साथ उसका सेवन करना चाहिए । इससे निश्चित रूप से मन के बहुत से रोग दूर हो सकते हैं या उनका उपशमन हो सकता है ।
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