गोस्वामीजी ने एक सूत्र दिया कि दर्पण का लाभ क्या है ? दशरथजी के जीवन में इससे तीन बातें आयीं और वे बड़े महत्व की हैं । कौन सी ? दर्पण देखने पर कभी-कभी अभिमान भी होता हैं । कोई व्यक्ति अगर खड़ा होकर बार-बार अपने को शीशे में देखे और मन ही मन खुश हो कि वाह, मैं कितना सुंदर हूँ । तो दर्पण ने तो उसके अभिमान को और भी बढ़ा दिया । दर्पण अभिमान घटाने के लिए होना चाहिए बढ़ाने के लिए नहीं । अभिप्राय यह है कि आत्मनिरीक्षण का हम सदुपयोग कर रहे हैं या दुरूपयोग । यह इसी बात पर निर्भर करता है कि आत्मनिरीक्षण से हमारा अभिमान बढ़ रहा है या घट रहा है । यदि हम आत्मनिरीक्षण करके इसी निष्कर्ष पर पहुंचे कि हम तो बहुत अच्छे हैं, हममें सारी विशेषताएँ हैं, तो हमने सही अर्थो में आत्मनिरीक्षण नहीं किया, बल्कि अपने अन्तःकरण में आत्मप्रशंसा की एक वृत्ति पाल ली, लेकिन दशरथजी की दृष्टि कहां थी ? जब उन्होंने सुना कि दशरथ के समान कोई नहीं है, तो उन्होंने दर्पण उठा लिया और अपने आपको देखा । लोग कह रहे हैं कि दशरथ में सारे गुण हैं, पर दशरथजी ने दर्पण में देखा कि मुकुट टेढ़ा है और यह दोष है । लोगों की दृष्टि भले ही न गयी हो, पर दशरथजी की दृष्टि अपने दोष पर गयी । मैं सभा में बैठा हूँ, राजसिंहासन पर बैठा हूँ और मेरा मुकुट एक ओर झुक गया है, असंतुलित हो गया है । राजा को समत्व में स्थिर रहना चाहिए । मुकुट राजसत्ता का चिह्न है । इसलिए उनके मन में पहली प्रेरणा उत्पन्न हुई कि वे अपने मुकुट को सीधा करें । साधक वह है जो आत्मनिरीक्षण करके अपने मन के असंतुलन को देख सके और उसे समत्व की प्रेरणा प्राप्त हो । दशरथजी के जीवन में पहली प्रेरणा प्राप्त हुई - उन्होंने तुरंत अपना मुकुट सीधा किया ।
रायॅ सुभायॅ मुकुट कर लीन्हा।
बदनु बिलोकि मुकुटु सम कीन्हा।।
रायॅ सुभायॅ मुकुट कर लीन्हा।
बदनु बिलोकि मुकुटु सम कीन्हा।।
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