Friday, 26 February 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ..........

किसी के लोभ-रोग की चिकित्सा करना हो, तो उसे दान की औषध दी जाती है । काम-रोग को दूर करने के लिए ब्रह्मचर्य की दवा दी जाती है । क्रोध की दवा है क्षमा । लेकिन समस्या यह भी है कि जहाँ इन औषधियों के द्वारा रोगों का उपशमन होता है, वहीं एक रोग ऐसा भी है, जिसमें इस चिकित्सा से वृद्धि हो जाती है । कौन-सा रोग है ? अंहकार ही वह रोग है । सत्कर्म के द्वारा जब हम किसी पाप पर विजय प्राप्त करते हैं, तब हमारे मन में धर्माभिमान की वृत्ति आ जाती है । यह एक बहुत बड़ी समस्या है । तो ऐसा कौन-सा उपाय है कि रोग भी दूर हो जाय और अभिमान भी न हो ? गोस्वामीजी मानस-रोगों की चिकित्सा का प्रारंभ ही यहीं से करते हैं - भगवान की कृपा से ही रोग दूर होते हैं और कर्त्तृत्व का अभिमान भी दूर हो जाता है । सत्कर्म तो जीवन में करना ही चाहिए, किन्तु यही भी जान लेना होगा कि केवल पुरूषार्थ से रोग दूर नहीं होंगे, वह तो भगवान की कृपा से ही दूर होंगे ।

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