Wednesday, 30 November 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

वर्णन आता है कि भगवान राम महर्षि भरद्वाज जी से कहते हैं - मुझे मार्ग बताइए । भगवान राम ने जो प्रश्न किया वह मनुष्य के जीवन का शाश्वत प्रश्न है । मनुष्य के जीवन में जो जिज्ञासाएं हैं, प्रश्न हैं, वे केवल त्रेतायुग के ही नहीं, अपितु प्रत्येक युग के प्रश्न हैं । सांसारिक स्थान में भी जब हम कहीं पहुँचना चाहते हैं, तब ठीक-ठीक मार्ग से ही चलकर पहुँच पाते हैं । और आगे चलकर भगवान राम इसी क्रम को बढ़ाते हैं । बाल्मीकि जी से पूछते हैं कि महाराज, मैं कहाँ जाऊँ ? - प्रभु का अभिप्राय था कि मार्ग का पता चल गया, पर मेरे जीवन का लक्ष्य क्या है ? भरद्वाज और बाल्मीकि दोनों ज्ञानी हैं । भरद्वाज से जब भगवान राम ने पूछा - मैं किस मार्ग से जाऊँ, जीवन में सही मार्ग कौन-सा है ? इसका तात्पर्य है कि भगवान राम एक मनुष्य की भाँति पूछ रहे हैं कि उचित मार्ग कौन-सा है ।
      .....आगे कल ...

Tuesday, 29 November 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

भगवान राम के चरित्र को आप यदि रामचरितमानस में देखें तो आपको यह लगेगा कि प्रभु के चरित्र में जहाँ मनुष्यत्व से काम नहीं चल सकता वहाँ पर ईश्वरत्व की भी आवश्यकता है । क्योंकि भई ! ईश्वरत्व यदि न होता तो रामायण में भगवान राम के कई जो कार्य थे वे अधूरे रह जाते । लेकिन साधारणतया भगवान राम बार-बार मनुष्य के समान ही व्यवहार करते हैं । हाँ ! यदा-कदा ईश्वरत्व भी दिखा देते हैं । जैसे कौसल्या अम्बा के सामने दिखाया । रामचरितमानस में लिखा हुआ है कि भगवान राम ने माँ के सामने विराट रूप प्रगट किया । यद्यपि विराट रूप दिखलाने के बाद भगवान को कहना तो यह चाहिए था कि अब तुमने तो पहचान लिया कि मैं ईश्वर हूँ, अब तो तुम्हें भ्रम नहीं होगा । किन्तु प्रभु ने ऐसा नहीं कहा । अपितु, गोस्वामीजी कहते हैं कि अपना ईश्वरत्व दिखाने के बाद कौसल्या अम्बा से हाथ जोड़कर कहने लगे - माँ ! मेरी प्रार्थना है कि यह बात आप किसी को मत बताइयेगा कि मैं ईश्वर हूँ । प्रभु का अभिप्राय था कि अगर मैं ईश्वरत्व न बताऊँ तो माँ ज्ञान से वंचित रहेगी, और यदि उन्होंने मुझे केवल ईश्वर ही मान लिया, तो मैं माँ के प्यार से वंचित हो जाऊँगा । और दोनों बातें बनी रहें, इसका उपाय यही है कि माँ को ज्ञान भी मिल जाय पर वह ज्ञान हमारे वात्सल्य में बाधक न बनने पाये । अगर माँ यह समझती रहीं कि यह साक्षात ईश्वर है तो न गोद में सुलावेंगी, और न ही मुझे दूध पिलावेंगी और न तो प्यार करेंगी, वरन ईश्वर समझ कर मेरी पूजा करने लगेंगी । इसलिए ज्ञान और प्रेम दोनों बना रहे ।

Monday, 28 November 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

गोस्वामीजी कहते हैं कि भगवान राम साक्षात ब्रह्म हैं । लेकिन जब जन्म लेते हैं तो आपको रामायण में श्रीराम का चरित्र मिलेगा, और जहाँ पर आपको श्रीराम का चरित्र मिले, वहाँ आप उनके चरित्र से सीखिए । परन्तु रामायण में भगवान राम का केवल मानवीय चरित्र हीं नहीं बल्कि उसमें एक ओर यदि श्रीराम का मनुष्यत्व मिलेगा तो दूसरी ओर ईश्वरत्व का भी दर्शन आपको होगा । भगवान राम ने क्या किया ? इसका उत्तर देते हुए गोस्वामीजी ने ठीक वही वाक्य कहा जो अभी आपसे कह रहा हूँ । वे कहते हैं कि 'चरित करत नर अनुहरत' किसलिए ? बोले ' संसृति सागर सेतु' भगवान राम ने अपने अवतार के द्वारा एक पुल बनाया था तथा उस पुल के द्वारा ईश्वर और मनुष्य को जोड़ दिया । ईश्वर होते हुए भी मनुष्य बने तथा मनुष्य के रूप में चरित्र किया । और चरित्र करते हुए, मनुष्य के जीवन में जो समस्याएँ होती हैं उनको उन्होंने अपने जीवन में स्वीकार किया और मनुष्य के रूप में, मानवीय समस्याओं को किस प्रकार सुलझाया जाय उसे प्रस्तुत किया ।

Sunday, 27 November 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

ईश्वर और मनुष्य का जो तत्व तुलसीदासजी दे रहे हैं उस पर आप ध्यान दीजिए । भगवान राम ईश्वर हैं तथा ईश्वर ने आकाशवाणी में कहा - देवताओं मत डरो, मैं जाऊँगा और तुम्हारे लिए मनुष्य बनूँगा । यहाँ पर समस्या रावण को मारने की है । किन्तु प्रश्न यह है कि बिना संसार में आये क्या ईश्वर रावण को मार सकता था कि नहीं ? अगर वह रावण को नहीं मार सकता तो काहे का ईश्वर है । लेकिन भगवान ने तो बड़ी अनोखी बात कह दी । भगवान चाहते तो अपने संकल्प से ही रावण को मार डालते और देवताओं से कहते कि देवताओं, तुम्हारी समस्या का समाधान हो गया, यह लो रावण को मैंने मार दिया । लेकिन भगवान ने जब कहा कि मैं मनुष्य बनूँगा, उससे कुछ और पता चला । इसका अभिप्राय है कि अगर मनुष्य ही सब कुछ कर लेता तो ईश्वर की आवश्यकता नहीं थी । और यदि ईश्वर अपने ईश्वरत्व के द्वारा करना चाहे तो उसे मनुष्य बनने की आवश्यकता नहीं । तब भगवान ने दोनों में सामंजस्य स्थापित किया कि यद्यपि हैं तो वे साक्षात ईश्वर, परन्तु ईश्वर होते हुए भी उन्होंने मनुष्य के रूप में अपने को प्रकट किया तो इसका तात्पर्य बड़ा अनोखा है । इसके द्वारा गोस्वामीजी ने एक अनोखा सूत्र संसार को दिया । गोस्वामीजी कहते हैं कि वस्तुतः ईश्वर और मनुष्य में दूरी थी । लगता था कि ईश्वर उधर है और मनुष्य इधर है । ईश्वर सबसे बड़ा है और मनुष्य सबसे छोटा है । किन्तु जैसे नदी के दो किनारे होते हैं तथा दोनों किनारों में दूरी होने के कारण एक किनारे का व्यक्ति दूसरे किनारे वाले व्यक्ति से दूर है । पर अगर उस नदी के दोनों किनारों के ऊपर पुल बना दिया जाय तो उसका परिणाम होगा कि दोनों किनारों के लोग एक दूसरे से मिल जायेंगे । ठीक इसी प्रकार श्रीराम ने भी ईश्वर और मनुष्य के बीच की दूरी को बड़े सुन्दर रूप में जोड़ा ।

Saturday, 26 November 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

रावण के अत्याचार से संत्रस्त होने के बाद पृथ्वी और देवता जब ब्रह्मा के पास गये, तब ब्रह्मा ने पहला वाक्य कहा - पृथ्वी, देवताओं, मुनियों ! मैं यह स्वीकार करता हूँ कि मैं पृथ्वी बना सकता हूँ, रावण का निर्माण कर सकता हूँ, पर इसके बाद भी रावण को नियंत्रित करना मेरे वश की बात नहीं है और तब ब्रह्मा ने एक बड़ा ही सुन्दर सूत्र दिया । यद्यपि ब्रह्मा यह कह सकते थे कि मनुष्य के सामर्थ्य की सीमा समाप्त हो गयी है । उसे सुनकर मनुष्य को बड़ी निराशा हो जाती कि हम कुछ नहीं कर सकते । पर ब्रह्मा ने कहा कि नहीं, जितनी हमारी सामर्थ्य है, उस सामर्थ्य का हम सदुपयोग करें । अगर न करें, तो भी हम सही मार्ग पर नहीं हैं । निष्क्रिय होकर सामर्थ्य और पौरुष का प्रयोग न करना भी व्यक्ति के लिए उपयुक्त नहीं है । लेकिन जब सारे पुरुषार्थ की सीमा समाप्त हो जाय तो उस समय अगर हमारी वृत्ति ईश्वर की ओर न जाय तो भी हम सही नहीं हैं । तो बुद्धि के देवता ब्रह्मा ने सूत्र दिया कि पृथ्वी ! घबराने की आवश्यकता नहीं है । कहा - पृथ्वी ! मैं भी अविनाशी नही हूँ, तुम भी अविनाशी नहीं हो, हम सब नाशवान हैं । पर इस विनाशी के पीछे जो अविनाशी तत्व है अब उसकी ओर ध्यान दो, वह मेरा भी सहायता करेगा, तुम्हारी भी सहायता करेगा । और लिखा हुआ है कि तब ईश्वर की प्रार्थना प्रारंभ हुई । यही साधना का क्रम है । सामर्थ्य की सीमा समाप्त हुई, बुद्धि ने ईश्वर की ओर इंगित किया । और जब प्रेमपूर्वक ईश्वर की प्रार्थना की गई तब अन्त में आकाशवाणी हुई - ईश्वर ने कहा कि मैं जाऊँगा और तुम्हारे लिए मनुष्य बनूँगा ।

Friday, 25 November 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........

यदि यह प्रश्न किया जाये कि ईश्वर की आवश्यकता जीवन में है या नहीं । मनुष्य के पुरुषार्थ की, व्यक्ति के सामर्थ्य की कोई सीमा है या नहीं ? जो लोग पुरुषार्थ का गुणगान करने वाले हैं वे तो यही कहेंगे कि मनुष्य के पुरुषार्थ की कोई सीमा नहीं है । मनुष्य के लिए कुछ असम्भव नहीं है । एक सज्जन ने मुझसे दोहराया कि नेपोलियन ने कहा है कि यह जो 'असम्भव' शब्द है उसको शब्दकोश से निकाल देना चाहिए । मैंने कहा कि आप जिसका उदाहरण दे रहे हैं, उसके जीवन का अन्तिम परिणाम क्या हुआ, आपको पता है ? जो 'असम्भव' शब्द निकालने वाला था, अन्त में एक द्वीप में एक कैदी के रूप में किस तरह मरा । यदि सब कुछ सम्भव होता तो बेचारा क्या अपने आप को कैद से भी छुड़ा न पाता ? मनुष्य को निष्क्रिय बनाने की आवश्यकता नहीं है, मनुष्य में इतनी क्षमता और पुरुषार्थ है कि वह बहुत कुछ कर सकता है । पर बहुत कुछ करने के बाद भी मनुष्य को कहीं न कहीं जाकर यह अनुभव होता है कि कुछ काम हमसे नहीं हो सकते । जब ब्रह्मा तक यह बात कहते हैं तब तो मनुष्य की यह धृष्टता ही होगी यदि वह कहे कि कुछ असम्भव नहीं है । जब पृथ्वी ने ब्रह्मा से कहा कि संसार का निर्माण तो आपने किया है, मेरा भी निर्माण आपने किया है, इसलिए रावण की समस्या का समाधान आप दे सकते हैं, तब ब्रह्मा अपनी असमर्थता व्यक्त करते हैं । ब्रह्मा रामचरितमानस की भाषा में बुद्धि के देवता हैं और बुद्धि के देवता ने, सृष्टि के निर्माता ने जो सत्य स्वीकार किया, उसको अगर हम न स्वीकार करें, हमारी बुद्धि न स्वीकार करे, तो यह मात्र अभिमान है और कुछ नहीं ।

Thursday, 24 November 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

श्रीराम का मनुष्यत्व और श्रीराम का ईश्वरत्व यह दो पक्ष है तथा इस सन्दर्भ में अलग-अलग मान्यताएँ हैं । गोस्वामीजी ने इसका बड़ा सुन्दर सामंजस्य करते हुए कहा कि श्रीराम को जब मनुष्य रूप में देखिए तो चरित्र देखिए और जब ईश्वर के रूप में देखिए तो लीला देखिए । गोस्वामीजी ने इसको एक सूत्र के माध्यम से बड़े सुन्दर ढंग से समझाया । रावण के अत्याचार से संत्रस्त होने के बाद देवताओं तथा ब्रह्मा ने मिलकर प्रार्थना की । तो अब प्रश्न यह है कि जिनसे प्रार्थना की जा रही है वे भगवान ईश्वर हैं कि मनुष्य हैं ? तो भी ! यह निश्चित बात है कि मनुष्य ईश्वर का आश्रय तभी लेता है जब उसके सामर्थ्य की सीमा समाप्त हो जाती है । तो यह तो स्पष्ट ही दिखाई दे गया कि ईश्वर का आश्रय तभी लिया गया जब मानवीय सामर्थ्य की सीमा समाप्त हो गयी । जब सारी सृष्टि व्याकुल हो गयी, मुनियों को भी लगा कि हम रावण के अत्याचार को समाप्त करने में असमर्थ हैं, जब स्वर्ग के देवताओं तक ने असमर्थता स्वीकार कर ली और यहाँ तक कि ब्रह्मा ने भी कह दिया कि रावण की समस्या का समाधान मेरे पास नहीं है, उस समय गोस्वामीजी एक बहुत बढ़िया बात कहते हैं - याद रखिए अगर श्रीराम को आप दो में से एक मान लीजिएगा तो घाटे में जरूर रहियेगा । केवल ईश्वर मानेंगे तो भी घाटे में रहेंगे और केवल मनुष्य मानेंगे तो भी घाटे में रहेंगे । गोस्वामीजी ने जो समन्वय प्रस्तुत किया, आप उस पर जरा ध्यान दीजिए ।

Wednesday, 23 November 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

अनेक महापुरूष तथा अनेक ग्रन्थ हैं और सभी किसी न किसी दृष्टि से बड़े विलक्षण हैं । पर अगर रामकथा और रामचरितमानस की दृष्टि से विचार करके देखें तो उनमें एक बड़ा अनोखा सामंजस्य दिखायी देगा । जितने पक्ष हैं, चाहे ज्ञान और भक्ति का पक्ष हो, चाहे कर्म और ज्ञान का पक्ष हो, चाहे पुरुषार्थ और प्रारब्ध का पक्ष हो अथवा नीति और प्रीति का पक्ष हो और चाहे स्वार्थ तथा परमार्थ का पक्ष हो, परन्तु विचार करके देखें तो पूरे रामायण में इन सबका सामंजस्य आपको मिलेगा । गोस्वामीजी कहते हैं - आप पक्षी (पक्षपाती) हैं तो लड़िए मत, आइए रामकथा में बैठ जाइए और फिर देखिए, गोस्वामीजी ने सारे पक्षों का सामंजस्य कितना सुन्दर किया ।

Tuesday, 22 November 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

यह जो श्रीराम की कथा है, इसे कौए ने कहा और हंसों ने सुना, पर गरुड़ जी भी बाद में जब पहुँच गये तो काकभुशुण्डिजी ने गरुड़ जी से बहुत बढ़िया बात कही । उन्होंने पूछा कि आप मेरे पास क्यों आये ? बोले - महाराज ! यह तो मैंने पहले ही बता दिया कि सन्देह के कारण आया । काकभुशुण्डिजी ने कहा - बिल्कुल नहीं आप भगवान को निरन्तर धारण करने वाले हैं, क्या आपको भ्रम हो सकता है ? आप आये नहीं हैं, आपको भगवान ने भेजा है । नहीं महाराज ! मुझसे तो प्रभु ने नहीं कहा । बोले - मैं जानता हूँ । आपके ह्रदय में भगवान थे, उन्होंने भेजा है । क्यों भेजा ? बोले - प्रभु को लगा होगा कि हंस तो रामकथा सुनने लगे पर पक्षियों के राजा तो गरुड़ हैं, जब तक वह कौए से न सुनें तब तक पूरी तरह से भक्ति की महिमा परतिष्ठापित नहीं होगी । इसलिए मोह के बहाने भगवान ने आपको भेजकर वस्तुतः भक्ति का बड़प्पन संसार के सामने सिद्ध किया ।

Monday, 21 November 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........

अन्तिम पक्षी रामायण के काकभुशुण्डिजी हैं । काकभुशुण्डि माने कौआ । गरुड़ जी ने उनसे पूछ लिया - आप कौआ बने थे तब बने थे, पर बाद में आप मनुष्य बन गये होते, और महाराज ! अगर पक्षी ही बनना था हंस बन जाते । काकभुशुण्डि जी ने कहा - बिल्कुल नहीं ! अगर मैं हंस बन जाता तो लोगों के मन में यही भ्रम हो जाता कि केवल हंस का विवेक जो है वही कल्याणकारी है । लेकिन अब जो मुझे, देखेगा वह मुझे देखकर यह समझ लेगा कि जब मैंने हठपूर्वक भक्ति का पक्ष लिया और तब भले महर्षि ने मुझे श्राप दिया - लेकिन फल क्या हुआ - मुनि दुर्लभ बर पायऊँ देखहु भजन प्रताप । - कौए का पंख नहीं कटा और गीधराज का पंख कटा, पर दोनों ही धन्य हुए । जिसका पंख नहीं कटा वह कौए के रूप में अयोध्या में पहुँचकर भगवान के साथ आंगन में खेलने लगा । और जिसका पंख कट गया भगवान उसके पास चलकर स्वयं आ गये तथा उसको गोद में उठा लिया । इसका अभिप्राय है कि हम चाहे उड़कर भगवान के पास पहुँच जायँ या स्वयं वे ही चलकर हमारे पास पहुँच जायँ । चाहे साधना की पराकाष्ठा हो और चाहे कृपा की पराकाष्ठा हो । गोस्वामीजी मानो प्रत्येक पक्षी (प्रत्येक पंथ के व्यक्ति) को आश्वासन देते हैं कि अगर आप चातक, कोकिल, कीर, चकोर तथा मोर हैं तब भी घबराने की आवश्यकता नहीं है । पक्ष का सदुपयोग कीजिए और पक्ष का सदुपयोग यही है कि उस पक्ष को हम भगवान से जोड़ने की चेष्टा करें ।

Sunday, 20 November 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

अत्यंत निंदनीय माने जाने वाले उस गीध पक्षी के पक्ष का सदुपयोग तब होता है जब रावण जनकनन्दिनी श्रीसीताजी का अपहरण करके ले जाता है और वे जनकनन्दिनी सीताजी का पक्ष लेते हैं । इसका अभिप्राय यह हुआ कि भले ही वे निन्दनीय पक्षी रहे हों, पर जब उन्होंने श्री सीताजी का पक्ष ले लिया, भक्ति का पक्ष ले लिया, तो बड़ी अनोखी बात हो गयी । यद्यपि देखने में तो यह लगा कि बड़ा उल्टा परिणाम हुआ कि अंत में रावण ने उनके पंख काट दिए । रावण का तात्पर्य है कि तूने सीताजी का पक्ष लिया तो तू पक्ष लेने का फल भोग, मैं तेरा पक्ष ही काट देता हूँ । जब पक्ष ही नहीं रहेगा तब तू क्या पक्ष लेगा । लोगों को लगा कि बेचारे पक्षी का पक्ष कट गया । गीधराज से किसी ने पूछा कि आपने पक्ष लेकर अंत में क्या पाया, अंत में तो आपका ही पक्ष कटा । रावण के सामने आप हार ही तो गये । गीध ने कहा कि इससे बढ़कर पक्ष की कोई सार्थकता नहीं है क्योंकि पक्ष जो है वह पक्षी को उड़ने में सहायता देता है । गीधराज ने कहा - जब मेरे पास पक्ष थे, तो मैंने उड़कर सूर्य तक पहुँचने की चेष्टा की, लेकिन मुझे बीच ही से लौटना पड़ा । मैं लक्ष्य तक नहीं पहुँच पाया । पर अब जब रावण ने मेरा पक्ष काट दिया तो सबसे बढ़िया स्थिति हो गई । क्योंकि गीधराज पंख कट जाने के बाद जब पड़े हुए थे और स्वयं भगवान उनके पास आये तथा उन्होंने गोद में उठा लिया तो गीधराज ने कहा - कितना अन्तर पड़ गया, अगर मेरे पास पक्ष होता तो मुझे प्रभु के पास उड़कर जाना पड़ता, पर जब पंख कट गया तो प्रभु को ही हमारे पास आना पड़ा । इससे बढ़कर पक्ष का सदुपयोग क्या होगा ? मैंने पक्ष खोया नहीं अपितु भगवान ने ही मेरा पक्ष स्वीकार कर लिया है । यही पक्षी की सार्थकता है । तो चातक, कोकिल, कीर, चकोर, मोर ही नहीं, गीध जो अत्यंत निम्न पक्षी माना जाता है, वह भी अपने पक्ष का सदुपयोग कर सकता है, भक्ति से जुड़कर । यही इसका सांकेतिक तात्पर्य है ।

Saturday, 19 November 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ..........

भगवान श्रीराघवेन्द्र जब जनकजी की वाटिका में जाते हैं तब गोस्वामीजी कहते हैं कि पक्षियों ने भगवान राम का स्वागत किया । और वे सब पक्षी अलग-अलग जाति के थे - चातक, कोकिल, कीर, चकोर और मोर सबने प्रभु का स्वागत किया । लेकिन गोस्वामीजी ने सबका इस रूप में सामंजस्य किया कि चातक, कोकिल, कीर, चकोर, मोर आदि जो पक्षी हैं, वे तो ऊँचे पक्षी माने जाते हैं । गोस्वामीजी से मानो यह प्रश्न किया गया कि महाराज ! भले ही श्रीराम का स्वागत करने के लिए पक्षी आये हों, लेकिन जितने भी पक्षी थे वे सभी अच्छे पक्षी ही तो थे, परन्तु संसार में तो बुरे पक्षी भी होते हैं और तब गोस्वामीजी ने जो अत्यंत निम्न माने जाने वाले सबसे निंदनीय पक्षी गीध तथा कौआ हैं, इन दोनों को भी राम और रामकथा से जोड़ दिया । गीध का रामकथा से जुड़ जाना, इसको यदि सांकेतिक भाषा में कहें तो यों कह सकते हैं कि गीध के पक्ष का सदुपयोग हो गया ।

Friday, 18 November 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ..........

.......  कल से आगे......
अगर हंस यह दावा करे कि मैं निष्पक्ष हूँ तो क्या यह दावा , क्या यह निष्पक्ष है ? क्योंकि यदि दूध और पानी को मिलाकर उसके सामने रख दिया जाय तो दूध और पानी को यदि वह केवल अलग-अलग करके रख देता तब तो निष्पक्ष था, पर जब वह दोनों को अलग करना छोड़कर केवल दूध को पी लेता है और पानी को छोड़ देता है तो वह दूध का पक्षपाती ही तो है । तो भई ! इस संवाद का तात्पर्य यह है कि जब दो पक्षी आपस में मिलते हैं, जब दो विचारधारा के लोग मिलते हैं तो उनके विचारों में टकराहट उत्पन्न होती है, विवाद होता है । और परिणाम यह हो जाता है कि न जाने किस सीमा तक वे एक-दूसरे को कष्ट पहुँचाने की चेष्टा करते हैं । परन्तु रामायण में एक बड़ा सुन्दर संकेत दिया गया कि भाई ! पक्षी रहो तो कोई आपत्ति नहीं, पर गोस्वामीजी कहते हैं कि कौए ने कहा और हंस ने सुना तो इसका अभिप्राय है कि कोई चेष्टा करनी चाहिए कि कौए और हंस में विवाद न होकर संवाद हो और उस संवाद का सूत्र है 'रामकथा' । क्योंकि अलग-अलग पक्ष के व्यक्तियों को मिलाने के लिए कोई माध्यम आप समाज में ढूँढ़ना चाहें, अलग-अलग विचारधारा के व्यक्तियों में सामंजस्य कैसे हो, एकत्व कैसे हो, अपनी-अपनी मान्यताओं में स्थिर रहकर भी हम एक-दूसरे से प्रेम कैसे करें, तो इसका सूत्र यही है । वस्तुतः यह जो रामचरितमानस है, रामकथा है, इसकी विशेषता यही है कि इसमें समस्त पक्षियों (सभी पक्ष के व्यक्तियों) का संवाद है ।

Thursday, 17 November 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

रामायण में पक्षी कहकर दो बातों की ओर संकेत किया गया है । एक तो जो आकाश में उड़ने वाला है वह पक्षी है, तथा दूसरे अर्थों में जिसके मन में किसी सिद्धांत के प्रति पक्षपात है, आग्रह है, वह पक्षी है । रामायण में दोनों अर्थ प्रस्तुत किये गये । काकभुशुण्डि जी तो पहले काक थे ही नहीं, वे तो मनुष्य थे, महर्षि लोमश जी ने कौआ होने का शाप दे दिया था और यह कहकर शाप दिया कि तुम मनुष्य होने के योग्य इसलिए नहीं हो क्योकिं मनुष्य को तो विवेकी तथा निष्पक्ष होना चाहिए, पर मैं स्पष्ट देख रहा हूँ कि तुम निष्पक्ष नहीं हो - इसलिए जा तू चाण्डाल पक्षी हो जा । तो उन्होंने जो बात कही, अगर गहराई से उस पर विचार करके देखें तो संसार में जितने व्यक्ति दिखाई दे रहे हैं, भले ही शरीर की दृष्टि से वे मनुष्य दिखाई दे रहे हों पर क्या कोई यह दावा कर सकता है कि मैं पक्षी नहीं हूँ । इसका अभिप्राय यह है कि व्यक्ति के मन में देश का पक्षपात है, प्रान्त का पक्षपात है, विचार का पक्षपात है । ऐसा कोई व्यक्ति नहीं है कि जिसके जीवन में किसी न किसी प्रकार का पक्षपात न हो, और यह पक्षपात जो है वह व्यक्ति की प्रकृति का एक अंग है ।  इस सन्दर्भ में रामायण में एक बहुत बढ़िया दर्शन दिया गया । प्रतीक यह चुना गया कि पक्षियों में एक पक्षी ऐसा है जो निष्पक्ष है और निष्पक्षता का प्रतीक जो पक्षी माना जाता है, वह हंस है । क्योकिं हंस के बारे में कहा जाता है कि दूध और पानी को अगर मिला कर रख दिया जाय तो वह उन्हें अलग कर देता है । इसी प्रकार हंस के समान हमारा विवेक होना चाहिए जो दूध और पानी को अलग कर दे ।
      .......आगे कल .....

Wednesday, 16 November 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

श्रीरामचरितमानस की विलक्षणता यह है कि इसमें एक सांकेतिक भाषा का प्रयोग किया गया है । श्रीरामचरितमानस के वैसे तो अनेक श्रोता और वक्ता हैं, पर एक वक्ता और श्रोता के रूप में जो नाम चुना गया है वह बड़ा अनोखा है । वे वक्ता हैं काकभुशुण्डि तथा श्रोता हैं - गरुड़ । भगवान शंकर ने पार्वती जी को अपना संस्मरण सुनाते हुए कहा, पार्वती ! जब सती-शरीर में मेरा तुम्हारा वियोग हो गया तब भ्रमण करते हुए मैं सुमेरु पर्वत पर पहुँचा, वहाँ मैंने एक अनोखा दृश्य यह देखा कि वृक्ष के नीचे एक कौआ बैठा हुआ कथा कह रहा था । वैसे चुनाव भी  बड़ा अनोखा किया गया । क्योकिं अगर वक्ता का कण्ठ मधुर हो तो सुनने वालों को बड़ा रस आता है । यदि कोई सुन्दर कण्ठ से पाठ करे तो आनंद आता है । पर व्यंग्य यह है कि पक्षी चुना भी तो कौआ । अगर कोई सबसे कर्कश कण्ठ वाला पक्षी माना जाता है तो कौआ ही है । एक और विचित्र विडम्बना यह है कि पक्षियों में सबसे निम्न कोटि का पक्षी भी कौआ ही माना जाता है और शंकरजी ने जब यह कहा कि कौआ कथा कह रहा था, तो पार्वतीजी ने पूछा कि जब कौआ कथा सुना रहा था तो वहाँ पर सुनने वाले भी कौए ही रहे होंगे ? भगवान शंकर ने कहा - नहीं पार्वती ! यही तो आश्चर्य है । मैंने जब जाकर देखा तो दिखायी यही पड़ा कि जितने हंस थे वे श्रोता बनकर बैठे हुए थे और कौआ कथा सुना रहा था । बड़ी विचित्र-सा भाषा है कि कौआ कथा कहता है, और हंस कथा सुनते हैं । पार्वतीजी को यह भी संदेह था कि जब कौआ बोलता होगा तो अपने ही कर्कश कण्ठ से बोलता होगा । पर शंकरजी ने उत्तर देते हुए एक विशेष शब्द जोड़ दिया । शंकरजी ने कहा - पार्वती ! कौआ बड़े मधुर शब्दों में बोला । कहने का अभिप्राय यह है कि स्वर की मधुरता से यदि अगर रामकथा मधुर लगे तो फिर यह संदेह होना स्वाभाविक है कि उसमें स्वर की कितना मिठास है और रामकथा की मिठास कितनी है ? पर जब कौए के स्वर में भी सुनकर रामकथा मीठी लगे तब मिठास रामकथा की ही है, उसमें और कोई वस्तु मिली हुई नहीं है । शंकरजी ने कहा कि रामकथा का महात्म्य यही है कि वह कौए के कर्कश कण्ठ को भी इतना मधुर बना देती है कि वह सुनने में सुस्वर और अत्यंत मधुर प्रतीत होता है ।

Tuesday, 15 November 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

...... कल से आगे.....
गोस्वामीजी ने इस सन्दर्भ में बड़ी सुन्दर बात कही है । यद्यपि रामायण को जो अधूरी दृष्टि से पढ़ते हैं वे उसका एक ही पक्ष देखते हैं, पर रामायण का विलक्षण पक्ष यह है कि एक ओर गोस्वामीजी ने बार-बार कहा कि श्रीराम साक्षात ईश्वर हैं । लेकिन उनका सामंजस्य यह है कि ईश्वर के साथ-साथ बार-बार उन्होंने एक शब्द जोड़ दिया कि श्रीराम ईश्वर होते हुए भी नरलीला कर रहे हैं । गोस्वामीजी ने इसका निराकरण करने के लिए दो सुन्दर शब्द चुने । एक शब्द है - रामचरितमानस । रामचरितमानस का अर्थ है कि श्री राम के चरित्र का वर्णन जिस ग्रन्थ से किया गया वह ग्रन्थ है रामचरितमानस । लगता है कि इस ग्रन्थ में चरित्र की प्रधानता है । पर रामायण में गोस्वामीजी ने एक अन्य शब्द का भी प्रयोग किया है । शंकरजी जब रामायण के एक प्रसंग में इसका नाम लेते हैं तब तो कहते हैं कि यह रामचरितमानस है, श्रीराम के चरित्र का वर्णन है, पर दूसरे प्रसंग में जब वे पार्वती जी को कथा सुनाने लगे तो यह नहीं कहा कि श्रीराम का चरित्र सुनो, उन्होंने कहा - गिरिजा ! श्रीराम की लीला सुनो । तो भई ! प्रश्न यह है कि यह लीला है कि चरित्र है ? गोस्वामीजी ने इसका बड़ा सुन्दर सामंजस्य करते हुए कहा कि जब मनुष्य के रूप में देखिए तो चरित्र देखिए और जब ईश्वर के रूप में देखिए तो लीला देखिए ।

Monday, 14 November 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

सबसे पहले एक बड़े महत्व का प्रश्न यह है कि भगवान राम मनुष्य हैं या साक्षात ईश्वर ? श्रीराम के विषय में दोनों बातें प्रचलित हैं । कुछ लोगों का आग्रह है कि श्रीराम मनुष्य हैं, महापुरुष हैं, बड़े श्रेष्ठ चरित्र वाले हैं और वे बड़े दावे से कहते हैं कि देवर्षि नारद से महर्षि वाल्मीकि जी ने जो प्रश्न पूछा वह यही तो था कि इस समय संसार में सबसे गुणवान व्यक्ति कौन है ? और तब महर्षि वाल्मीकि के समक्ष देवर्षि नारद ने श्रीराम के चरित्र का वर्णन किया था । इसका तात्पर्य है कि श्रीराम महामानव हैं और उनमें विशिष्ट गुण हैं, इसलिए हम उनकी पूजा करते हैं । और दूसरे पक्ष का आग्रह है कि श्रीराम साक्षात ईश्वर हैं, अनन्तकोटि ब्रह्मांड के नायक हैं । इस संदर्भ में श्रीरामचरितमानस की क्या मान्यता है, आप जरा इस पर भी एक दृष्टि डालें ।
     .......आगे कल .....

Sunday, 13 November 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

आपने महात्माओं से सुना होगा, तथा शास्त्रों में यह तो अध्ययन किया ही होगा कि जीवन का चरम लक्ष्य ईश्वर को पाना है । ईश्वर के पास पहुँच जाना ही व्यक्ति की चरम उपलब्धि है । पर यहाँ, जो जीवन का चरम लक्ष्य है (ईश्वर), उसने महर्षि भरद्वाज के चरणों में प्रणाम करके कहा कि आप मुझे यह बताइए कि मैं किस मार्ग से जाऊँ ? इस प्रकार ये सारे प्रश्न पढ़कर तो यही लगता है कि वे चाहे केवट से वार्तालाप कर रहे हों और चाहे महर्षि भरद्वाज से, परन्तु उनके संबंध में जो मान्यताएँ प्रचलित है उस समय वे उनसे बिल्कुल भिन्न व्यवहार कर रहे हैं, मानो लक्ष्य ही मार्ग के विषय में महर्षि भरद्वाज से जिज्ञासा प्रकट कर रहा है । जो पार करने वाला है वह स्वयं पार होने के लिए गंगा के किनारे खड़ा है । भगवान राम की इस जिज्ञासा का तात्पर्य क्या है ?

Saturday, 12 November 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

जब भगवान श्रीराम अयोध्या से यात्रा करते हैं तब सबसे पहले भगवान राम का मिलन केवट से होता है और इसके पश्चात यात्रा करते हुए भगवान श्रीराघवेन्द्र तीर्थराज प्रयाग में महर्षि भरद्वाज के आश्रम में पहुँचते हैं । वहाँ रात्रि विश्राम करते हैं । प्रातःकाल त्रिवेणी में स्नान करने के पश्चात भगवान श्रीराघवेन्द्र महर्षि भरद्वाज के चरणों में प्रणाम करते हैं और उसके पश्चात श्रीराघवेन्द्र ने महर्षि से जो प्रश्न किया वह बड़ा ही अनोखा है, अद्भुत है । लगता है भगवान राम का (ईश्वर) का सारा व्यवहार बदला हुआ है । उसका श्रीगणेश केवट के प्रसंग से ही प्रारंभ हो गया था । जब भगवान श्रीराघवेन्द्र ने केवट से यह कहा कि केवट ! तुम मुझे पार उतार दो, तो वह भी एक नयी बात थी । क्योंकि भगवान की घोषणा तो यह है कि संसार-सागर में जो व्यक्ति डूब रहे हैं या संसार-सागर में जो पार उतरना चाहते हैं, मैं उन्हें पार उतारने वाला हूँ । लेकिन गंगा के किनारे कुछ उल्टी-सी बात करने लगे । संसार-सागर से पार करने वाला ईश्वर जब केवट से यह कहने लगता है कि मुझे पार उतार दो, तो सुनकर अविश्वास-सा होता है कि क्या यही ईश्वर की वाणी है ? और इसी प्रकार से महर्षि भरद्वाज से जब वे प्रश्न करते हैं तो भी ईश्वर का बदला हुआ रूप हमारे सामने आता है । वस्तुतः महर्षि भरद्वाज के चरणों में प्रणाम करने के पश्चात भगवान राम ने जो प्रश्न किया वह क्या है ?
    ....आगे कल से....
आज एक नये प्रसंग का प्रारंभ है,  जिसका अमृत लाभ हम सबको आने वाले दिनों में नित्य प्राप्त होगा । परम पूज्य गुरुदेव भगवान से यही प्रार्थना है कि हम सबके जीवन में सत्संग की यह निरंतरता बनी रहे । जय सियाराम ।

Friday, 11 November 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

हनुमानजी संजीवनी बूटी लेने गये पर वे दवा को पहचान नहीं पाए । तब पूरा पर्वत ही उठाकर चल पड़े । मार्ग में उनका मिलन अयोध्या में श्रीभरत से होता है । प्रभु ने हनुमानजी से पूछा - हनुमान, तुम्हारा अयोध्या जाने का विचार कैसे हुआ ? उन्होंने कहा - महाराज ! मेरा विचार थोड़े ही हुआ, वह तो आपने मुझे भेज दिया । क्यों ? आपने जब देखा कि लक्ष्मण तो अस्वस्थ हैं ही और उनकी दवा लाने वाला स्वयं बीमार हो रहा है । उसकी भी चिकित्सा कराने के लिए किसी-न-किसी के पास तो भेजना ही चाहिए । तो आपने मुझे चिकित्सा के लिए भरतजी के पास भेज दिया था । भगवान राम और भरतजी की भूमिका तो आप जानते ही हैं । भगवान राम ईश्वर हैं और श्रीभरत मूर्तिमान प्रेम । हनुमानजी जब गये तो भगवान को प्रणाम करके गये थे - भगवान श्रीराम के चरणों को ह्रदय में रखकर गए थे । पर जब अयोध्या से लौटने लगे तो उन्होंने कुछ बदल दिया । तब उन्होंने भगवान के चरणों में प्रणाम नहीं किया, श्रीभरत के चरणों में प्रणाम किया । प्रभु ने पूछ लिया - क्या अयोध्या जाकर तुमने मन्त्र बदल दिया ? इष्ट बदल लिया ? मेरे चरण भूल गए ? हनुमानजी ने कहा - प्रभो ! मुझे आपके स्थान पर श्रीभरत के चरणों का आश्रय इसलिए लेना पड़ा कि जब मैं आपके चरणों का आश्रय लेकर चला तो अहंकार की छाया आ गयी थी और वह छाया श्रीभरत की भुजाओं की कृपा से मिटी । इसलिए मैं समझता हूँ कि आपके चरणों की अपेक्षा भरतजी की भुजाएँ कहीं अधिक समर्थ हैं । अभिप्राय यह है कि ईश्वर का आश्रय लेने के बाद भी बुराई पूरी तौर से तब तक नहीं मिटेगी, जब तक हम प्रेम का आश्रय नहीं लेंगे । भगवतप्रेम की परिपूर्णता जब जीवन में आती है तब मानसिक दोषों का निराकरण अपने आप हो जाता है ।

Thursday, 10 November 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

लक्ष्मणजी के समान प्रबुद्ध कौन हो सकता है - जब समस्त भोग-विलासों से वैराग्य हो जाय तभी जानना चाहिए कि जीव जाग गया है । लक्ष्मणजी तो नित्य जाग्रत, सदा प्रबुद्ध वैराग्य के प्रतीक हैं । पर आज एक क्षण के लिए जैसे उन्हें झपकी-सी आ गयी थी । जब मेघनाद आक्रमण करने आया, तो बन्दरों ने लक्ष्मणजी को पुकारा और तब लक्ष्मणजी धनुष-बाण हाथ में लेकर क्रुद्ध हो चल पड़े । महान प्रबुद्ध साधक, जो काम का विजेता है, वैराग्यवान है, वह काम से लड़ने चल पड़ा । लेकिन क्षण भर के लिए जैसे ईश्वर विस्मृत हो गया, ईश्वर से जैसे एकत्व होना चाहिए, वह एक क्षण के लिए छूट गया । और तब वैराग्य मूर्छित हो गया । मेघनाद के बाण से लक्ष्मण मूर्छित हो गए । पर हनुमानजी ने तुरन्त उन्हें उठा लिया और प्रभु की गोद में सुला दिया । इसका अभिप्राय क्या है ? गोस्वामीजी हनुमानजी के लिए वैराग्य के साथ एक शब्द और जोड़ देते हैं - हनुमानजी प्रबल वैराग्य हैं । भगवान राम की दृष्टि हनुमानजी की ओर गई । वैराग्य मूर्छित हो गया तो उसे चैतन्य करने का कार्य प्रबल वैराग्य को सौंपा गया ! भगवान का संकेत यह था कि काम के प्रहार से लक्ष्मण मूर्छित हैं तो उसकी दवा प्रबल वैराग्य हनुमानजी ले आवें ।

Wednesday, 9 November 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

लंका में भगवान राम के सामने जो संकट आया, श्रीलक्ष्मण जी बीमार पड़ गए, वहाँ पर भी सन्दर्भ वही है - काम का आक्रमण हुआ है वैराग्य पर । मेघनाद ने लक्ष्मणजी पर आक्रमण किया । लक्ष्मणजी ने मेघनाद को बार-बार पराजित किया था । पर पराजित होने के बाद भी वह अपनी पराजय स्वीकार नहीं करता । तात्पर्य यह है कि वैराग्य के द्वारा आप काम को हराने की चेष्टा कीजिए, पर काम इतनी जल्दी हार नहीं मानता । एक बार तो ऐसी स्थिति आ गयी कि लक्ष्मणजी के प्रहार से मेघनाद को लगा कि वह मरा, और तब उसने अपने अन्तिम शस्त्र का प्रयोग किया । लक्ष्मणजी पर ऐसी शक्ति का प्रयोग किया, जो अमोघ थी । लक्ष्मणजी मूर्छित हो गए । भगवान राम ने लक्ष्मणजी से पूछा - लक्ष्मण ! मूर्छा से तुमने क्या अर्थ लिया ? तुम मेघनाद के बाण से मूर्छित हो गए, इससे बढ़कर कोई आश्चर्य नहीं । लक्ष्मणजी ने भगवान के चरणों में प्रणाम करके कहा - प्रभो ! इससे तो मुझे सबसे बड़ी शिक्षा मिली । क्या ? मैं जीवन भर जागता रहा, कभी सोया नहीं कि कहीं कोई बुराई मुझ पर आक्रमण न कर दे । पर पता चल गया कि बिना आपकी गोद में सोए, केवल अपने जागने से बुराइयों से पूरी तरह बचना सम्भव नहीं है ।

Tuesday, 8 November 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

श्रीभरत, स्वयं उनके मन में कोई रोग नहीं है, पर सजग इतने हैं कि गोस्वामीजी ने लिखा - "तप तनु कसहीं" - इस शब्द पर जरा ध्यान दीजिए । इसका अर्थ क्या है ? जब आप किसी सर्राफ के यहाँ सोना लेकर जाते हैं, तो वह सोने को कसौटी पर कसकर देखता है । लेकिन वह एक बार ही तो देखता है । यह तो नहीं कि वह सोने को हर घण्टे निकालकर बार-बार रगड़े । अगर कोई दिन-रात देखता ही रहे, तब तो कोई ग्राहक उसके पास नहीं आएगा । वह तो बस एक बार देखेगा और कह देगा कि सोना खरा है या खोटा । पर गोस्वामीजी एक बहुत बड़ी बात कहते हैं - इस सोने को चाहें तो आप एक ही बार कसौटी पर कसें, पर मन के सोने को जीवन भर कसौटी पर कसते रहिए । कभी मत विश्वास कीजिए कि अब मेरा मन खरा हो गया, अब कभी खोटा नहीं होगा । इसलिए श्रीभरत जैसे महापुरुष भी चौदह वर्षों तक एक ही कार्य करते रहे - अपने शरीर को कसकर देखते रहते हैं कि कहीं भोग की वृत्ति तो नहीं आ गई, कहीं लालसा या अधिकार की वृत्ति तो नहीं आ गई ? जब श्रीभरत अपने चरित्र का ऐसा अद्भुत शोधन करते हैं, तो परिणाम क्या होता है ? जब भरतजी जैसे व्यक्ति, जिनका चरित्र इतना निष्कलुष है, प्रतिक्षण मानसिक बुराइयों की ओर से इतने सावधान हैं, तो उनकी प्रजा-सेवा का परिणाम यह होता है कि प्रजा की बुद्धि शुद्ध हो जाती है । प्रजा मात्र का अन्तःकरण पवित्र हो जाता है, सबके मन के रोग दूर हो जाते हैं ।

Monday, 7 November 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

भगवान राम ने पादुकाएँ देते हुए जब श्रीभरत की ओर देखा और पूछा - मिल गया आधार ? तो श्रीभरत ने तुरन्त कहा - महाराज, मैं आपको लौटाने आया था और समझ गया कि आप मेरे साथ लौट रहे हैं । इन दोनों रूपों में आप ही मेरे साथ चल रहे हैं । जो यह भेद करते हैं कि यहाँ ईश्वर आधा है, यहाँ चौथाई है - कई लोग कहा करते हैं कि मनुष्य में ईश्वर का अंश अधिक और पशुओं में कम है - उनका गणित तो अनोखा ही है । श्रीभरत का गणित क्या है ? ईश्वर जितना पूर्ण श्रीराम में है, उतना उनकी पादुकाओं में भी है । कितनी परिपूर्ण दृष्टि है उनकी । इसी दिव्य परिपूर्ण दृष्टि के कारण उन्हें उन पादुकाओं में श्रीराम और श्रीसीता की प्रत्यक्ष अनुभूति हो रही है, उन्हें यही अनुभव हो रहा है कि श्रीराम परिपूर्ण रूप से उनके साथ अयोध्या लौट आए हैं । और इसलिए जब वे सिंहासन पर उन्हें बिठाते हैं तो लोगों को आश्चर्य होता है कि जहाँ पर प्रभु को बिठाना चाहिए वहाँ पर पादुकाओं को रख दिया । पर श्रीभरत की भावना क्या है ? श्रीभरत को अगर खड़ाऊँ दिखाई दे रहा हो, तब तो सिंहासन पर नहीं बिठाते, पर जब उन्हें साक्षात भगवान और श्रीसीता ही दिखाई दे रहे हैं तो उन्होंने सिंहासन पर पादुका नहीं, भगवान और श्रीसीताजी को बिठाया है । और उन्हें बिठाकर राजकाज चला रहे हैं । राजा कौन है ? भगवान श्रीराम और श्रीसीताजी । श्रीभरत नित्य प्रभु की पादुकाओं का पूजन करते हैं और उनसे आज्ञा लेकर राज्य का संचालन करते हैं । पादुकाओं की पूजा करने का तात्पर्य यही है कि वे नित्य भगवान राम से पूछते हैं कि महाराज ! राज्य आपका है, सिंहासन पर आप बैठते हैं, बताइए अयोध्या का राज्य कैसे चलावें ? भरतजी ने, न तो कभी अपने में स्वामित्व की अहंता स्वीकार की और न ही राज्य की ममता ।

Sunday, 6 November 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

भगवान श्रीराघवेन्द्र पादुकाएँ देते हुए भरतजी से बोले - भरत ! मिल गया आधार ? श्रीभरत आनन्दविभोर थे ; बोले - हाँ प्रभु ! मिल गया । जिसकी ओर भी दृष्टि पड़ी, सबने कहा - मिल गया । अलग-अलग प्रकार के लोग हैं । कोई नाम-जप करनेवाले, कोई सेवावृत्ति वाले, तो कोई कुल की मर्यादा का पालन करनेवाले - सबको इस प्रतीक से आश्रय मिल गया । क्या आश्रय मिल गया ? भगवान राम की ये दो पादुकाएँ प्रजा के प्राणों की रक्षा करने के लिए मानो दो पहरेदार हैं । और ज्ञानी के लिए ? महाराज जनक तो महान ज्ञानी थे । भगवान राम की दृष्टि उनकी ओर गई ; आपको कैसा लगा ? जनकजी बोले - मुझे तो लग रहा है मानो यह पादुका नहीं, भरतजी के प्रेमरत्न को रखने के लिए स्वर्ण मंजूषा दी गयी है । जो राम-नाम के जप करने वाले थे, उन्हें लगा कि ये रा और म दो अक्षर हैं । माताओं को लगा कि यह 'कुलकपाट' कुल की लज्जा बचाने वाले किवाड़ हैं । जो सेवा करने वाले हैं, उनको लगा - ये सेवाधर्म के दो निर्मल नेत्र हैं । सबको कुछ न कुछ मिला ।

Saturday, 5 November 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

भगवान श्रीराम ने जो पादुकाएँ श्रीभरत को दीं, उसे लाया कौन था ? यह भगवान राम के साथ तो थीं नहीं । वे तो जूते और पादुकाएँ छोड़कर ही आए थे । कैकेयीजी की यह आज्ञा थी । तो यह आई कहाँ से ? यह श्रीभरत ही लाए थे । क्यों लाए थे ? भगवान राम के राज्याभिषेक के लिए वे सारी सामग्री लाए थे, उसमें छत्र, सिंहासन, चामर, तीर्थों के जल और राजा के चरणों में जो पादुका धारण कराई जाती है, वह पादुका भी श्रीभरत ही लेकर आए थे । जब भरतजी ने कहा कि महाराज ! कोई सहारा दीजिए, तो प्रभु ने मुस्कराकर उन्हीं की लाई हुई पादुकाओं को उठाकर उन्हें दे दिया । मानो भगवान का संकेत यह था कि भरत ! यह जो सहारा मैं तुम्हें दे रहा हूँ, यह तो तुम्हारा ही लाया हुआ है, तुम्हारा ही दिया हुआ है । सन्त आश्रय लेता है या मैं आश्रय देता हूँ । सन्त ईश्वर से कहता है कोई आश्रय दीजिए और ईश्वर कहते हैं - मेरे पास जो भी है सब तो भक्तों का ही दिया हुआ है । अगर मैं कुछ दूँगा, अपनी खड़ाऊँ दूँगा तो वह भी मेरी अपनी नहीं है, वह भी तो तुम्हारी दी हुई है । भक्त जो मुझे भेंट करता है, वह तो मैं उसे देता हूँ ।

Friday, 4 November 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

चित्रकूट यात्रा में श्रीभरत सारी सवारियों के होते हुए भी वे स्वयं पैदल चलते हैं । प्रबन्ध सबके लिए कर दिया, पर स्वयं पैदल चले । किसी ने उनसे पूछ लिया कि पैदल चलने का क्या अर्थ है ? उन्होंने कहा कि जिनके पास साधन की सम्पत्ति है, वे सवारी पर चलें, पर जो बेचारा निःसाधन है, जिसके पास रथ, घोड़ा, हाथी, पालकी आदि नहीं है, वह तो पैदल ही चलेगा । हम तो निःसाधन हैं और निःसाधन इस तरह से कि ज्ञान कोटि के साधक से लेकर जो बिल्कुल साधनहीन हैं, उन सबको हमें ईश्वर के सम्मुख ले जाना है - यही श्रीभरत की विशेषता है । और इसलिए सबको लेकर चित्रकूट पहुँचने पर वे भगवान श्रीराम से कहते हैं - महाराज ! सब निराधार नहीं रह सकते । भगवान ने कहा - भरत ! तुम तो निराधार रह सकते हो । उन्होंने कहा - नहीं महाराज ! मुझे तो आधार अवश्य चाहिए । श्रीभरत कहते हैं - महाराज ! बिना आधार के मन को सन्तोष और शान्ति नहीं मिलेगी । श्रीभरत का तात्पर्य यह है कि व्यक्ति के मन को कोई न कोई आश्रय चाहिए, मन की शान्ति के लिए कोई न कोई उपाय चाहिए । श्रीभरत के शब्दों से प्रभु प्रसन्न हो गए और उन्होंने अपनी पादुकाएँ श्रीभरत को दे दीं और श्रीभरत सबकी भावनाओं को तृप्त करते हुए पादुकाएँ स्वीकार करते हैं और उन्हें अपने मस्तक पर रखते हैं ।

Thursday, 3 November 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

श्रीभरत में सभी भावों की परिपूर्णता है । समस्त लोगों को साथ लेकर चित्रकूट जाने का तात्पर्य भी यही है । जो घोड़े पर बैठकर गये वे योगी थे और जो हाथी पर बैठकर गये वे ज्ञानी । इसे आप भौतिक अर्थों में न लें । इसका अभिप्राय यह है कि घोड़े पर जानेवाला व्यक्ति वह है जो घोड़े की चंचलता पर नियंत्रण स्थापित कर सके । घोड़े की लगाम कस कर पकड़े हुए हो । ईश्वर को पाने की जो साधना योगी की है, वह घोड़े पर सवार उस व्यक्ति की तरह है, जो मन के घोड़े पर बैठा हुआ है और उस पर ध्यान, धारणा, प्रत्याहार, समाधि का लगाम लगाए कसकर पकड़े हुए ईश्वर की दिशा में चल रहा है । हाथी विचार का प्रतीक है । विचार पर आरूढ़ होकर, विचार का आश्रय लेकर जो चल रहा है, वह ज्ञानी है । जो रथ पर बैठे हैं ; रामायण में रथ को धर्म का प्रतीक माना गया है । जो व्यक्ति विविध प्रकार के सत्कर्म करने वाले हैं, वे धर्म के रथ पर बैठकर ईश्वर की ओर बढ़ रहे हैं । और जो भक्त हैं, वे पालकी पर बैठकर जा रहे हैं । पालकी बड़ी आरामदेह सवारी है । ढोए कोई दूसरा और यात्रा पूरी हो किसी अन्य की । चलना किसी को पड़ता है और यात्रा किसी और की पूरी होती है । श्रीभरत ने इस यात्रा में सबके लिए - जो जिसका अधिकारी है, उसके लिए वैसा ही - प्रबन्ध कर दिया है, क्योंकि उनके पास सब हैं - वे ज्ञानी भी हैं, योगी भी हैं, भक्त भी हैं और धार्मिक भी ।

Wednesday, 2 November 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

निर्गुण और सगुण उपासना का एक मुख्य भेद है । निर्गुण उपासना में आधार की अपेक्षा नहीं है । निरालम्ब भाव से व्यक्ति को ऊपर उठने की प्रेरणा दी जाती है । यह अपने स्थान पर, जो इसके अधिकारी हैं, उनके लिए बड़े महत्व की बात है । निरालम्ब भाव से भी लोग उठ सकते हैं । हनुमानजी जैसे आकाशमार्ग से समुद्र को पार कर रहे हैं, हनुमानजी तो हर तरह से चल सकते हैं, जल पर भी, नभ पर भी, थल पर भी । इसका अभिप्राय यह है कि हनुमानजी तो ज्ञानमार्ग, भक्तिमार्ग, कर्ममार्ग - सभी मार्गों से चलने के अभ्यस्त हैं । सर्वत्र उनकी पूर्णता है । निर्गुण-निराकार में कोई अवलम्बन नहीं है । न तो नाम है, न रूप और न गुण । व्यक्ति को बिल्कुल निरालम्ब भाव से अपने को ऊपर उठाना है । लेकिन सगुण-साकार की उपासना में मान्यता यह है कि व्यक्ति जीवन में बिना आधार के नहीं रह सकता । मान लीजिए कोई अधिक आधार लेने लगे तो यह आलोचना की जा सकती है कि बहुत आधार ले रहा है, लेकिन जो सब आधार छोड़ देता है, उसको भी तो आखिर पृथ्वी के आधार पर ही तो खड़ा होना पड़ता है । अगर कोई दूसरे के कन्धे का सहारा न ले, लाठी का सहारा न ले तो कम-से-कम पृथ्वी का सहारा ले लेना ही पड़ता है । कोई आधार तो चाहिए ही । वैसे श्रीभरत में सभी भावों की परिपूर्णता है ।

Tuesday, 1 November 2016

युग तुलसी श्रीरामकिंकर उवाच ........

एक व्यक्ति के रूप में भगवान की सेवा करना उतना कठिन नहीं है, जितना सारे संसार में भेदों के होते हुए भी सब रूपों में भगवान को देख लेना और सबकी सेवा करना । यह इतना कठिन कार्य है कि इनका निर्वाह केवल दो पात्रों ने किया, या तो हनुमानजी ने या श्रीभरत ने । यह अभेद अनन्यता इन्हीं दोनों में है । इनकी दृष्टि में श्रीराम में ही श्रीराम नहीं हैं, वे तो जिससे मिलते हैं, जिसको देखते हैं, उसी को प्रणाम करते हैं । सर्वत्र उन्हें श्रीराम का ही दर्शन होता है । और इस दर्शन से क्या होता है ? श्रीभरत तो न ममता को स्वीकार करते हैं न अहंता को । भगवान राम कहते हैं - भरत, मेरा तो ऐसा विश्वास है कि जैसा सुन्दर राज्य तुम चला सकते हो, वैसा कोई दूसरा नहीं चला पाएगा । भगवान की इस बात को श्रीभरत अस्वीकार नहीं करते । गुरु वसिष्ठ और अयोध्यावासी तो यह समझ रहे थे कि भरत भगवान राम से लौटने का हठ करेंगे । पर श्रीभरत ने ऐसा नहीं किया । उन्होंने भगवान से कहा - बिना आधार के मन में न सन्तोष है और न शान्ति । मुझे कुछ आधार दीजिए । वे भगवान श्रीराम से कहते हैं - महाराज ! सब निराधार नहीं रह सकते । भगवान ने कहा - भरत ! तुम तो निराधार रह ही सकते हो । उन्होंने कहा - नहीं महाराज ! मुझे तो आधार अवश्य ही चाहिए । श्रीभरत में दोनों प्रकार की निष्ठा है । वे भगवान को सर्वव्यापी देखकर निर्गुण-निराकार भी स्वीकार करते हैं और दूसरी ओर आधार और प्रतीक को महत्व देकर सगुण-साकार की निष्ठा का भी पालन करते हैं । यह प्रतीक, जिसकी हम मन्दिर में आराधना करते हैं, यह आधार है । इस आधार से हमारे अन्तर्मन को सहायता मिलती है ।