अत्यंत निंदनीय माने जाने वाले उस गीध पक्षी के पक्ष का सदुपयोग तब होता है जब रावण जनकनन्दिनी श्रीसीताजी का अपहरण करके ले जाता है और वे जनकनन्दिनी सीताजी का पक्ष लेते हैं । इसका अभिप्राय यह हुआ कि भले ही वे निन्दनीय पक्षी रहे हों, पर जब उन्होंने श्री सीताजी का पक्ष ले लिया, भक्ति का पक्ष ले लिया, तो बड़ी अनोखी बात हो गयी । यद्यपि देखने में तो यह लगा कि बड़ा उल्टा परिणाम हुआ कि अंत में रावण ने उनके पंख काट दिए । रावण का तात्पर्य है कि तूने सीताजी का पक्ष लिया तो तू पक्ष लेने का फल भोग, मैं तेरा पक्ष ही काट देता हूँ । जब पक्ष ही नहीं रहेगा तब तू क्या पक्ष लेगा । लोगों को लगा कि बेचारे पक्षी का पक्ष कट गया । गीधराज से किसी ने पूछा कि आपने पक्ष लेकर अंत में क्या पाया, अंत में तो आपका ही पक्ष कटा । रावण के सामने आप हार ही तो गये । गीध ने कहा कि इससे बढ़कर पक्ष की कोई सार्थकता नहीं है क्योंकि पक्ष जो है वह पक्षी को उड़ने में सहायता देता है । गीधराज ने कहा - जब मेरे पास पक्ष थे, तो मैंने उड़कर सूर्य तक पहुँचने की चेष्टा की, लेकिन मुझे बीच ही से लौटना पड़ा । मैं लक्ष्य तक नहीं पहुँच पाया । पर अब जब रावण ने मेरा पक्ष काट दिया तो सबसे बढ़िया स्थिति हो गई । क्योंकि गीधराज पंख कट जाने के बाद जब पड़े हुए थे और स्वयं भगवान उनके पास आये तथा उन्होंने गोद में उठा लिया तो गीधराज ने कहा - कितना अन्तर पड़ गया, अगर मेरे पास पक्ष होता तो मुझे प्रभु के पास उड़कर जाना पड़ता, पर जब पंख कट गया तो प्रभु को ही हमारे पास आना पड़ा । इससे बढ़कर पक्ष का सदुपयोग क्या होगा ? मैंने पक्ष खोया नहीं अपितु भगवान ने ही मेरा पक्ष स्वीकार कर लिया है । यही पक्षी की सार्थकता है । तो चातक, कोकिल, कीर, चकोर, मोर ही नहीं, गीध जो अत्यंत निम्न पक्षी माना जाता है, वह भी अपने पक्ष का सदुपयोग कर सकता है, भक्ति से जुड़कर । यही इसका सांकेतिक तात्पर्य है ।