यदि यह प्रश्न किया जाये कि ईश्वर की आवश्यकता जीवन में है या नहीं । मनुष्य के पुरुषार्थ की, व्यक्ति के सामर्थ्य की कोई सीमा है या नहीं ? जो लोग पुरुषार्थ का गुणगान करने वाले हैं वे तो यही कहेंगे कि मनुष्य के पुरुषार्थ की कोई सीमा नहीं है । मनुष्य के लिए कुछ असम्भव नहीं है । एक सज्जन ने मुझसे दोहराया कि नेपोलियन ने कहा है कि यह जो 'असम्भव' शब्द है उसको शब्दकोश से निकाल देना चाहिए । मैंने कहा कि आप जिसका उदाहरण दे रहे हैं, उसके जीवन का अन्तिम परिणाम क्या हुआ, आपको पता है ? जो 'असम्भव' शब्द निकालने वाला था, अन्त में एक द्वीप में एक कैदी के रूप में किस तरह मरा । यदि सब कुछ सम्भव होता तो बेचारा क्या अपने आप को कैद से भी छुड़ा न पाता ? मनुष्य को निष्क्रिय बनाने की आवश्यकता नहीं है, मनुष्य में इतनी क्षमता और पुरुषार्थ है कि वह बहुत कुछ कर सकता है । पर बहुत कुछ करने के बाद भी मनुष्य को कहीं न कहीं जाकर यह अनुभव होता है कि कुछ काम हमसे नहीं हो सकते । जब ब्रह्मा तक यह बात कहते हैं तब तो मनुष्य की यह धृष्टता ही होगी यदि वह कहे कि कुछ असम्भव नहीं है । जब पृथ्वी ने ब्रह्मा से कहा कि संसार का निर्माण तो आपने किया है, मेरा भी निर्माण आपने किया है, इसलिए रावण की समस्या का समाधान आप दे सकते हैं, तब ब्रह्मा अपनी असमर्थता व्यक्त करते हैं । ब्रह्मा रामचरितमानस की भाषा में बुद्धि के देवता हैं और बुद्धि के देवता ने, सृष्टि के निर्माता ने जो सत्य स्वीकार किया, उसको अगर हम न स्वीकार करें, हमारी बुद्धि न स्वीकार करे, तो यह मात्र अभिमान है और कुछ नहीं ।
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