ईश्वर और मनुष्य का जो तत्व तुलसीदासजी दे रहे हैं उस पर आप ध्यान दीजिए । भगवान राम ईश्वर हैं तथा ईश्वर ने आकाशवाणी में कहा - देवताओं मत डरो, मैं जाऊँगा और तुम्हारे लिए मनुष्य बनूँगा । यहाँ पर समस्या रावण को मारने की है । किन्तु प्रश्न यह है कि बिना संसार में आये क्या ईश्वर रावण को मार सकता था कि नहीं ? अगर वह रावण को नहीं मार सकता तो काहे का ईश्वर है । लेकिन भगवान ने तो बड़ी अनोखी बात कह दी । भगवान चाहते तो अपने संकल्प से ही रावण को मार डालते और देवताओं से कहते कि देवताओं, तुम्हारी समस्या का समाधान हो गया, यह लो रावण को मैंने मार दिया । लेकिन भगवान ने जब कहा कि मैं मनुष्य बनूँगा, उससे कुछ और पता चला । इसका अभिप्राय है कि अगर मनुष्य ही सब कुछ कर लेता तो ईश्वर की आवश्यकता नहीं थी । और यदि ईश्वर अपने ईश्वरत्व के द्वारा करना चाहे तो उसे मनुष्य बनने की आवश्यकता नहीं । तब भगवान ने दोनों में सामंजस्य स्थापित किया कि यद्यपि हैं तो वे साक्षात ईश्वर, परन्तु ईश्वर होते हुए भी उन्होंने मनुष्य के रूप में अपने को प्रकट किया तो इसका तात्पर्य बड़ा अनोखा है । इसके द्वारा गोस्वामीजी ने एक अनोखा सूत्र संसार को दिया । गोस्वामीजी कहते हैं कि वस्तुतः ईश्वर और मनुष्य में दूरी थी । लगता था कि ईश्वर उधर है और मनुष्य इधर है । ईश्वर सबसे बड़ा है और मनुष्य सबसे छोटा है । किन्तु जैसे नदी के दो किनारे होते हैं तथा दोनों किनारों में दूरी होने के कारण एक किनारे का व्यक्ति दूसरे किनारे वाले व्यक्ति से दूर है । पर अगर उस नदी के दोनों किनारों के ऊपर पुल बना दिया जाय तो उसका परिणाम होगा कि दोनों किनारों के लोग एक दूसरे से मिल जायेंगे । ठीक इसी प्रकार श्रीराम ने भी ईश्वर और मनुष्य के बीच की दूरी को बड़े सुन्दर रूप में जोड़ा ।
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