Friday, 18 November 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ..........

.......  कल से आगे......
अगर हंस यह दावा करे कि मैं निष्पक्ष हूँ तो क्या यह दावा , क्या यह निष्पक्ष है ? क्योंकि यदि दूध और पानी को मिलाकर उसके सामने रख दिया जाय तो दूध और पानी को यदि वह केवल अलग-अलग करके रख देता तब तो निष्पक्ष था, पर जब वह दोनों को अलग करना छोड़कर केवल दूध को पी लेता है और पानी को छोड़ देता है तो वह दूध का पक्षपाती ही तो है । तो भई ! इस संवाद का तात्पर्य यह है कि जब दो पक्षी आपस में मिलते हैं, जब दो विचारधारा के लोग मिलते हैं तो उनके विचारों में टकराहट उत्पन्न होती है, विवाद होता है । और परिणाम यह हो जाता है कि न जाने किस सीमा तक वे एक-दूसरे को कष्ट पहुँचाने की चेष्टा करते हैं । परन्तु रामायण में एक बड़ा सुन्दर संकेत दिया गया कि भाई ! पक्षी रहो तो कोई आपत्ति नहीं, पर गोस्वामीजी कहते हैं कि कौए ने कहा और हंस ने सुना तो इसका अभिप्राय है कि कोई चेष्टा करनी चाहिए कि कौए और हंस में विवाद न होकर संवाद हो और उस संवाद का सूत्र है 'रामकथा' । क्योंकि अलग-अलग पक्ष के व्यक्तियों को मिलाने के लिए कोई माध्यम आप समाज में ढूँढ़ना चाहें, अलग-अलग विचारधारा के व्यक्तियों में सामंजस्य कैसे हो, एकत्व कैसे हो, अपनी-अपनी मान्यताओं में स्थिर रहकर भी हम एक-दूसरे से प्रेम कैसे करें, तो इसका सूत्र यही है । वस्तुतः यह जो रामचरितमानस है, रामकथा है, इसकी विशेषता यही है कि इसमें समस्त पक्षियों (सभी पक्ष के व्यक्तियों) का संवाद है ।

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