लंका में भगवान राम के सामने जो संकट आया, श्रीलक्ष्मण जी बीमार पड़ गए, वहाँ पर भी सन्दर्भ वही है - काम का आक्रमण हुआ है वैराग्य पर । मेघनाद ने लक्ष्मणजी पर आक्रमण किया । लक्ष्मणजी ने मेघनाद को बार-बार पराजित किया था । पर पराजित होने के बाद भी वह अपनी पराजय स्वीकार नहीं करता । तात्पर्य यह है कि वैराग्य के द्वारा आप काम को हराने की चेष्टा कीजिए, पर काम इतनी जल्दी हार नहीं मानता । एक बार तो ऐसी स्थिति आ गयी कि लक्ष्मणजी के प्रहार से मेघनाद को लगा कि वह मरा, और तब उसने अपने अन्तिम शस्त्र का प्रयोग किया । लक्ष्मणजी पर ऐसी शक्ति का प्रयोग किया, जो अमोघ थी । लक्ष्मणजी मूर्छित हो गए । भगवान राम ने लक्ष्मणजी से पूछा - लक्ष्मण ! मूर्छा से तुमने क्या अर्थ लिया ? तुम मेघनाद के बाण से मूर्छित हो गए, इससे बढ़कर कोई आश्चर्य नहीं । लक्ष्मणजी ने भगवान के चरणों में प्रणाम करके कहा - प्रभो ! इससे तो मुझे सबसे बड़ी शिक्षा मिली । क्या ? मैं जीवन भर जागता रहा, कभी सोया नहीं कि कहीं कोई बुराई मुझ पर आक्रमण न कर दे । पर पता चल गया कि बिना आपकी गोद में सोए, केवल अपने जागने से बुराइयों से पूरी तरह बचना सम्भव नहीं है ।
No comments:
Post a Comment