Tuesday, 15 November 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

...... कल से आगे.....
गोस्वामीजी ने इस सन्दर्भ में बड़ी सुन्दर बात कही है । यद्यपि रामायण को जो अधूरी दृष्टि से पढ़ते हैं वे उसका एक ही पक्ष देखते हैं, पर रामायण का विलक्षण पक्ष यह है कि एक ओर गोस्वामीजी ने बार-बार कहा कि श्रीराम साक्षात ईश्वर हैं । लेकिन उनका सामंजस्य यह है कि ईश्वर के साथ-साथ बार-बार उन्होंने एक शब्द जोड़ दिया कि श्रीराम ईश्वर होते हुए भी नरलीला कर रहे हैं । गोस्वामीजी ने इसका निराकरण करने के लिए दो सुन्दर शब्द चुने । एक शब्द है - रामचरितमानस । रामचरितमानस का अर्थ है कि श्री राम के चरित्र का वर्णन जिस ग्रन्थ से किया गया वह ग्रन्थ है रामचरितमानस । लगता है कि इस ग्रन्थ में चरित्र की प्रधानता है । पर रामायण में गोस्वामीजी ने एक अन्य शब्द का भी प्रयोग किया है । शंकरजी जब रामायण के एक प्रसंग में इसका नाम लेते हैं तब तो कहते हैं कि यह रामचरितमानस है, श्रीराम के चरित्र का वर्णन है, पर दूसरे प्रसंग में जब वे पार्वती जी को कथा सुनाने लगे तो यह नहीं कहा कि श्रीराम का चरित्र सुनो, उन्होंने कहा - गिरिजा ! श्रीराम की लीला सुनो । तो भई ! प्रश्न यह है कि यह लीला है कि चरित्र है ? गोस्वामीजी ने इसका बड़ा सुन्दर सामंजस्य करते हुए कहा कि जब मनुष्य के रूप में देखिए तो चरित्र देखिए और जब ईश्वर के रूप में देखिए तो लीला देखिए ।

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