आपने महात्माओं से सुना होगा, तथा शास्त्रों में यह तो अध्ययन किया ही होगा कि जीवन का चरम लक्ष्य ईश्वर को पाना है । ईश्वर के पास पहुँच जाना ही व्यक्ति की चरम उपलब्धि है । पर यहाँ, जो जीवन का चरम लक्ष्य है (ईश्वर), उसने महर्षि भरद्वाज के चरणों में प्रणाम करके कहा कि आप मुझे यह बताइए कि मैं किस मार्ग से जाऊँ ? इस प्रकार ये सारे प्रश्न पढ़कर तो यही लगता है कि वे चाहे केवट से वार्तालाप कर रहे हों और चाहे महर्षि भरद्वाज से, परन्तु उनके संबंध में जो मान्यताएँ प्रचलित है उस समय वे उनसे बिल्कुल भिन्न व्यवहार कर रहे हैं, मानो लक्ष्य ही मार्ग के विषय में महर्षि भरद्वाज से जिज्ञासा प्रकट कर रहा है । जो पार करने वाला है वह स्वयं पार होने के लिए गंगा के किनारे खड़ा है । भगवान राम की इस जिज्ञासा का तात्पर्य क्या है ?
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