Tuesday, 8 November 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

श्रीभरत, स्वयं उनके मन में कोई रोग नहीं है, पर सजग इतने हैं कि गोस्वामीजी ने लिखा - "तप तनु कसहीं" - इस शब्द पर जरा ध्यान दीजिए । इसका अर्थ क्या है ? जब आप किसी सर्राफ के यहाँ सोना लेकर जाते हैं, तो वह सोने को कसौटी पर कसकर देखता है । लेकिन वह एक बार ही तो देखता है । यह तो नहीं कि वह सोने को हर घण्टे निकालकर बार-बार रगड़े । अगर कोई दिन-रात देखता ही रहे, तब तो कोई ग्राहक उसके पास नहीं आएगा । वह तो बस एक बार देखेगा और कह देगा कि सोना खरा है या खोटा । पर गोस्वामीजी एक बहुत बड़ी बात कहते हैं - इस सोने को चाहें तो आप एक ही बार कसौटी पर कसें, पर मन के सोने को जीवन भर कसौटी पर कसते रहिए । कभी मत विश्वास कीजिए कि अब मेरा मन खरा हो गया, अब कभी खोटा नहीं होगा । इसलिए श्रीभरत जैसे महापुरुष भी चौदह वर्षों तक एक ही कार्य करते रहे - अपने शरीर को कसकर देखते रहते हैं कि कहीं भोग की वृत्ति तो नहीं आ गई, कहीं लालसा या अधिकार की वृत्ति तो नहीं आ गई ? जब श्रीभरत अपने चरित्र का ऐसा अद्भुत शोधन करते हैं, तो परिणाम क्या होता है ? जब भरतजी जैसे व्यक्ति, जिनका चरित्र इतना निष्कलुष है, प्रतिक्षण मानसिक बुराइयों की ओर से इतने सावधान हैं, तो उनकी प्रजा-सेवा का परिणाम यह होता है कि प्रजा की बुद्धि शुद्ध हो जाती है । प्रजा मात्र का अन्तःकरण पवित्र हो जाता है, सबके मन के रोग दूर हो जाते हैं ।

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