अन्तिम पक्षी रामायण के काकभुशुण्डिजी हैं । काकभुशुण्डि माने कौआ । गरुड़ जी ने उनसे पूछ लिया - आप कौआ बने थे तब बने थे, पर बाद में आप मनुष्य बन गये होते, और महाराज ! अगर पक्षी ही बनना था हंस बन जाते । काकभुशुण्डि जी ने कहा - बिल्कुल नहीं ! अगर मैं हंस बन जाता तो लोगों के मन में यही भ्रम हो जाता कि केवल हंस का विवेक जो है वही कल्याणकारी है । लेकिन अब जो मुझे, देखेगा वह मुझे देखकर यह समझ लेगा कि जब मैंने हठपूर्वक भक्ति का पक्ष लिया और तब भले महर्षि ने मुझे श्राप दिया - लेकिन फल क्या हुआ - मुनि दुर्लभ बर पायऊँ देखहु भजन प्रताप । - कौए का पंख नहीं कटा और गीधराज का पंख कटा, पर दोनों ही धन्य हुए । जिसका पंख नहीं कटा वह कौए के रूप में अयोध्या में पहुँचकर भगवान के साथ आंगन में खेलने लगा । और जिसका पंख कट गया भगवान उसके पास चलकर स्वयं आ गये तथा उसको गोद में उठा लिया । इसका अभिप्राय है कि हम चाहे उड़कर भगवान के पास पहुँच जायँ या स्वयं वे ही चलकर हमारे पास पहुँच जायँ । चाहे साधना की पराकाष्ठा हो और चाहे कृपा की पराकाष्ठा हो । गोस्वामीजी मानो प्रत्येक पक्षी (प्रत्येक पंथ के व्यक्ति) को आश्वासन देते हैं कि अगर आप चातक, कोकिल, कीर, चकोर तथा मोर हैं तब भी घबराने की आवश्यकता नहीं है । पक्ष का सदुपयोग कीजिए और पक्ष का सदुपयोग यही है कि उस पक्ष को हम भगवान से जोड़ने की चेष्टा करें ।
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