Thursday, 17 November 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

रामायण में पक्षी कहकर दो बातों की ओर संकेत किया गया है । एक तो जो आकाश में उड़ने वाला है वह पक्षी है, तथा दूसरे अर्थों में जिसके मन में किसी सिद्धांत के प्रति पक्षपात है, आग्रह है, वह पक्षी है । रामायण में दोनों अर्थ प्रस्तुत किये गये । काकभुशुण्डि जी तो पहले काक थे ही नहीं, वे तो मनुष्य थे, महर्षि लोमश जी ने कौआ होने का शाप दे दिया था और यह कहकर शाप दिया कि तुम मनुष्य होने के योग्य इसलिए नहीं हो क्योकिं मनुष्य को तो विवेकी तथा निष्पक्ष होना चाहिए, पर मैं स्पष्ट देख रहा हूँ कि तुम निष्पक्ष नहीं हो - इसलिए जा तू चाण्डाल पक्षी हो जा । तो उन्होंने जो बात कही, अगर गहराई से उस पर विचार करके देखें तो संसार में जितने व्यक्ति दिखाई दे रहे हैं, भले ही शरीर की दृष्टि से वे मनुष्य दिखाई दे रहे हों पर क्या कोई यह दावा कर सकता है कि मैं पक्षी नहीं हूँ । इसका अभिप्राय यह है कि व्यक्ति के मन में देश का पक्षपात है, प्रान्त का पक्षपात है, विचार का पक्षपात है । ऐसा कोई व्यक्ति नहीं है कि जिसके जीवन में किसी न किसी प्रकार का पक्षपात न हो, और यह पक्षपात जो है वह व्यक्ति की प्रकृति का एक अंग है ।  इस सन्दर्भ में रामायण में एक बहुत बढ़िया दर्शन दिया गया । प्रतीक यह चुना गया कि पक्षियों में एक पक्षी ऐसा है जो निष्पक्ष है और निष्पक्षता का प्रतीक जो पक्षी माना जाता है, वह हंस है । क्योकिं हंस के बारे में कहा जाता है कि दूध और पानी को अगर मिला कर रख दिया जाय तो वह उन्हें अलग कर देता है । इसी प्रकार हंस के समान हमारा विवेक होना चाहिए जो दूध और पानी को अलग कर दे ।
      .......आगे कल .....

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